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Friday, April 24, 2026
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महिला आरक्षण बिल पर गरमा-गरमी: 1996 से 2023 तक क्या हुए बदलाव, जानिए पुराने और नए कानून में क्या है अंतर?

महिला आरक्षण बिल 1996 से 2023 तक कैसे बदला? जानिए पुराने और नए महिला आरक्षण कानून में क्या अंतर है, नारी शक्ति वंदन अधिनियम की खास बातें, सीट रोटेशन पर विवाद, परिसीमन और जनगणना की भूमिका और इससे भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी पर क्या असर पड़ेगा।

नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। भारत में महिला आरक्षण का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना है। देश की आधी आबादी महिलाएं हैं, लेकिन संसद और विधानसभाओं में उनकी संख्या अभी भी काफी कम है। इसी को सुधारने के लिए महिला आरक्षण बिल लाया गया।

1996 में आया था पहला महिला आरक्षण बिल

सबसे पहले यह बिल साल 1996 में पेश किया गया था, जिसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रस्ताव था। यह बिल कई बार संसद में पेश हुआ, लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से पास नहीं हो सका। साल 2010 में यह राज्यसभा से तो पास हो गया, लेकिन लोकसभा में अटक गया।

पुराने बिल पर क्यों हुआ विवाद?

पुराने बिल को लेकर कई तरह के विवाद भी सामने आए थे। कुछ राजनीतिक दलों ने पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की मांग की, जबकि कुछ नेताओं ने सीटों के रोटेशन का विरोध किया। उनका कहना था कि हर चुनाव में सीट बदलने से नेताओं का अपने क्षेत्र से जुड़ाव कमजोर हो सकता है।

2023 में आया नया बिल – नारी शक्ति वंदन अधिनियम

इसके बाद साल 2023 में केंद्र सरकार ने नया महिला आरक्षण बिल पेश किया, जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम नाम दिया गया। यह बिल संसद के दोनों सदनों से पास हो चुका है और इससे महिलाओं के प्रतिनिधित्व बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है। नए बिल में भी लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान रखा गया है। इसमें अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाओं को भी आरक्षण का लाभ मिलेगा। साथ ही यह आरक्षण 15 साल के लिए लागू रहेगा, जिसे जरूरत पड़ने पर आगे बढ़ाया जा सकता है। हालांकि, पुराने और नए बिल में सबसे बड़ा अंतर इसके लागू होने की प्रक्रिया में है। नया बिल तुरंत लागू नहीं होगा। इसके लिए पहले देश में जनगणना होगी और फिर परिसीमन के जरिए सीटों का नया निर्धारण किया जाएगा।

इसके बाद ही आरक्षण लागू किया जाएगा, जिसके कारण इसमें देरी होने की संभावना है। इसके अलावा सीटों के रोटेशन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। नए बिल के अनुसार हर चुनाव में आरक्षित सीटें बदलेंगी। इससे अलग-अलग क्षेत्रों की महिलाओं को मौका मिलेगा, लेकिन इससे विकास कार्यों की निरंतरता प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि महिला आरक्षण बिल भारतीय राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है। इससे संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ेगी और नीति निर्माण में उनकी भागीदारी मजबूत होगी। महिला आरक्षण बिल का उद्देश्य महिलाओं को बराबरी का अधिकार देना है। हालांकि इसकी प्रक्रिया लंबी है, लेकिन अगर यह सही तरीके से लागू हुआ तो देश की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

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