नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। भारत में जल्द ही डीलिमिटेशन 2026 यानी परिसीमन की प्रक्रिया शुरू होने वाली है। इसे लेकर देशभर में चर्चा तेज है, खासकर दक्षिणी राज्यों में चिंता भी देखने को मिल रही है। लेकिन सरकार ने साफ कहा है कि इससे किसी राज्य को नुकसान नहीं होगा।
क्या है डीलिमिटेशन (परिसीमन)?
परिसीमन का मतलब होता है चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय करना। इसे आसान भाषा में समझें तो जैसे परिवार बड़ा होता है तो कमरों का बंटवारा बदलता है, वैसे ही आबादी बढ़ने पर लोकसभा सीटों और क्षेत्रों को भी बदला जाता है। इसका मकसद है कि हर सांसद लगभग बराबर संख्या में लोगों का प्रतिनिधित्व करे।
क्यों हो रहा है डीलिमिटेशन 2026?
भारत में अभी लोकसभा की 543 सीटें हैं, जो 1971 की जनगणना के आधार पर तय की गई थीं। लेकिन अब देश की आबादी 140 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है। ऐसे में: कई राज्यों में एक सांसद पर बहुत ज्यादा आबादी का बोझ है प्रतिनिधित्व में असंतुलन पैदा हो गया है इसी को ठीक करने के लिए डीलिमिटेशन किया जा रहा है।
क्या बड़े बदलाव हो सकते हैं?
सरकारी सूत्रों के अनुसार लोकसभा की सीटें करीब 50% बढ़कर 850 तक हो सकती हैं हर राज्य की सीटें भी लगभग उसी अनुपात में बढ़ेंगी लेकिन राज्यों के बीच सीटों का अनुपात (प्रोपोर्शन) जैसा है वैसा ही रहेगा तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों के नेताओं का कहना है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा काम किया है। अगर सीटें आबादी के हिसाब से बढ़ीं, तो उनकी हिस्सेदारी कम हो सकती है। हालांकि सरकार ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा है कि किसी भी राज्य का नुकसान नहीं होगा।
पहले सीटें फ्रीज क्यों की गई थीं?
1977 में संविधान संशोधन के जरिए लोकसभा सीटों को फ्रीज कर दिया गया था, ताकि जो राज्य जनसंख्या नियंत्रण करें, उन्हें नुकसान न हो। यह फ्रीज 2026 तक लागू है, जो अब खत्म होने जा रहा है।
सरकार का क्या कहना है?
सरकार का कहना है कि डीलिमिटेशन का उद्देश्य किसी राज्य को फायदा या नुकसान देना नहीं है। बल्कि लोकतंत्र को और मजबूत और प्रतिनिधित्व को बेहतर बनाना है नए परिसीमन में भी राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखा जाएगा डीलिमिटेशन 2026 भारत के लोकतंत्र के लिए एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। इससे संसद में सीटें बढ़ेंगी, प्रतिनिधित्व बेहतर होगा, लेकिन राजनीतिक बहस भी तेज रहेगी।




