नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। सुप्रीम कोर्ट में नकली लॉ डिग्री और कानूनी पेशे से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश CJI Suryakant की एक टिप्पणी ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। सुनवाई के दौरान उन्होंने कथित तौर पर कुछ लोगों के व्यवहार की तुलना “कॉकरोच” से की, जिसके बाद यह बयान सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक हलकों तक चर्चा का विषय बन गया है।
बेरोजगार युवाओं पर टिप्पणी से बढ़ी बहस
सुनवाई के दौरान CJI ने कुछ बेरोजगार युवाओं के व्यवहार पर टिप्पणी करते हुए कहा कि नौकरी न मिलने के बाद कुछ लोग अलग-अलग रास्ते अपना लेते हैं। उन्होंने कहा कि कुछ लोग सोशल मीडिया पर सक्रिय हो जाते हैं, कुछ आरटीआई कार्यकर्ता बन जाते हैं और फिर लगातार संस्थानों या व्यक्तियों पर सवाल उठाते रहते हैं। इसी संदर्भ में “कॉकरोच” शब्द का इस्तेमाल किया गया।
कॉकरोच शब्द का मतलब क्या समझाया जा रहा है?
इस टिप्पणी को लेकर कानूनी और सामाजिक हलकों में अलग-अलग व्याख्याएं सामने आ रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि “कॉकरोच” शब्द का इस्तेमाल यहां प्रतीकात्मक (metaphorical) रूप में किया गया है। कॉकरोच को आमतौर पर ऐसे जीव के रूप में देखा जाता है जो छिपे हुए स्थानों में रहते हैं अंधेरे और उपेक्षित जगहों में पनपते हैं और धीरे-धीरे अपनी संख्या बढ़ाते हैं इसी आधार पर माना जा रहा है कि यह तुलना उन गतिविधियों से की गई है जो छिपकर या गुमनाम तरीके से की जाती हैं।
सांप-बिच्छू की जगह कॉकरोच क्यों?
इस बयान पर सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि सांप या बिच्छू की जगह कॉकरोच शब्द क्यों चुना गया। विशेषज्ञों के मुताबिक इसका कारण इन जीवों के व्यवहार में अंतर है। सांप और बिच्छू को सीधे और आक्रामक खतरे से जोड़ा जाता है जबकि कॉकरोच को छिपकर रहने, गंदगी में फैलने और लगातार मौजूद रहने वाले जीव के रूप में देखा जाता है। इसी वजह से माना जा रहा है कि यह तुलना किसी “छिपे हुए व्यवहार” या “ऑनलाइन गतिविधियों” को दर्शाने के लिए की गई थी।
सोशल मीडिया और डिजिटल गतिविधियों से जुड़ रहा है मामला
कई जानकारों का मानना है कि यह टिप्पणी उन लोगों की ओर इशारा कर सकती है जो सोशल मीडिया पर गुमनाम रहकर संस्थानों, व्यक्तियों या व्यवस्था पर लगातार हमला करते हैं। कॉकरोच की तेजी से फैलने वाली प्रकृति को भी इस संदर्भ में समझाया जा रहा है।
बयान पर शुरू हुई नई बहस
इस टिप्पणी के सामने आने के बाद न्यायिक भाषा और सार्वजनिक बयानबाजी को लेकर बहस तेज हो गई है। कुछ लोग इसे प्रतीकात्मक उदाहरण मान रहे हैं, जबकि कुछ इसे संवेदनशील समूह के लिए आपत्तिजनक बता रहे हैं। फिलहाल इस मामले पर आधिकारिक स्पष्टीकरण का इंतजार किया जा रहा है।





