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Thursday, April 9, 2026
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दिल्ली, मुंबई समेत कई बड़े एयरपोर्ट्स पर विमानों के GPS डेटा में छेड़छाड़, संसद में केंद्र ने दी जानकारी

देश के कई बड़े एयरपोर्ट्स पर विमानों में GPS स्पूफिंग और GNSS इंटरफेरेंस की घटनाएं सामने आई हैं। केंद्र सरकार ने संसद में इस गंभीर समस्या की जानकारी दी है।

नई दिल्‍ली / रफ्तार डेस्‍क । केंद्र सरकार ने संसद में बताया कि देश के कई प्रमुख एयरपोर्ट्स, जिनमें दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, हैदराबाद, अमृतसर, बेंगलुरु और चेन्नई शामिल हैं, पर GPS स्पूफिंग और GNSS इंटरफेरेंस की घटनाएं दर्ज की गई हैं। इस प्रकार की समस्या से सेटेलाइट आधारित नेविगेशन सिस्टम प्रभावित होता है और उड़ान संचालन पर गंभीर असर पड़ सकता है। सरकार ने बताया कि नवंबर 2023 में DGCA ने सभी एयरलाइंस और एयरपोर्ट्स को ऐसे मामलों की कंपलसरी रिपोर्टिंग का निर्देश दिया था। इसके बाद से देशभर के एयरपोर्ट्स और एयरलाइंस से लगातार रिपोर्ट्स आ रही हैं, जिनका विश्लेषण कर सुरक्षा उपायों को मजबूत किया जा रहा है।

निगरानी और तकनीकी जांच बढ़ाई गई

नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू ने संसद को जानकारी दी कि जब कभी सैटेलाइट आधारित नेविगेशन सिस्टम में रुकावट आती है, तब भारत में मौजूद जमीनी नेविगेशन और सर्विलांस नेटवर्क उड़ानों को सुरक्षित बनाए रखने में पूरी तरह सक्षम होता है। उन्होंने कहा कि सैटेलाइट संकेतों में हस्तक्षेप उड़ानों की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती हो सकता है। इसे देखते हुए सरकार ने निगरानी और तकनीकी जांच को और सख्त कर दिया है। मंत्री ने यह भी भरोसा दिलाया कि देश के सभी प्रमुख एयरपोर्ट्स इन घटनाओं को लगातार दर्ज कर रहे हैं, ताकि किसी भी अप्रत्याशित समस्या पर तुरंत कार्रवाई की जा सके और यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित रहे।

क्‍या है जीपीएस स्पूफिंग?

जीपीएस स्पूफिंग एक प्रकार का साइबर हमला है, जिसमें हैकर्स नकली सैटेलाइट सिग्नल भेजकर किसी विमान या GPS-आधारित डिवाइस को गलत लोकेशन या डेटा दिखाने पर मजबूर करते हैं। इस स्थिति में विमान का नेविगेशन सिस्टम गलत पोज़िशन, अलर्ट या टेरेन वार्निंग दे सकता है, जिससे विमान अपनी असली दिशा से भटक सकता है या ऐसी स्थिति दिख सकती है जो वास्तव में मौजूद ही नहीं होती। हाल ही में दिल्ली एयरपोर्ट के आसपास कुछ उड़ानों को 60 नॉटिकल मील तक गलत लोकेशन डेटा प्राप्त हुआ। इस वजह से सुरक्षा की दृष्टि से कुछ विमानों को जयपुर या लखनऊ जैसे नजदीकी एयरपोर्ट्स की ओर डायवर्ट करना पड़ा।

हवाई सुरक्षा पर खतरे

एयरपोर्ट के आसपास GPS स्पूफिंग या GNSS इंटरफेरेंस होने पर इसके असर सीधे विमान के नेविगेशन, एयरस्पेस सुरक्षा और पायलट के कामकाज पर पड़ते हैं। आधुनिक विमान इन सिस्टम्स पर काफी हद तक निर्भर हैं, इसलिए सिग्नल में कोई भी बदलाव भारी सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकता है।

तकनीकी और ऑपरेशनल खतरे

GPS या GNSS सिग्नल में गड़बड़ी से विमान की पोजीशन, ऊँचाई और गति जैसे डेटा में गलतियां हो सकती हैं। परिणामस्वरूप विमान अपने निर्धारित मार्ग से भटक सकता है या अनजाने में सैन्य या संवेदनशील क्षेत्रों में प्रवेश कर सकता है, जो सुरक्षा के लिहाज से गंभीर है। विमानों के महत्वपूर्ण सिस्टम जैसे रनवे अवेयरनेस, टेरेन अलर्ट और ऑटोपायलट सीधे GPS पर निर्भर हैं। स्पूफिंग के दौरान ये सिस्टम गलत अलर्ट या फेल हो सकते हैं, जिससे टेरेन या बाधाओं से टकराने का खतरा बढ़ जाता है।

वहीं, लैंडिंग और अप्रोच के दौरान विमान जमीन के बेहद करीब होता है और विजिबिलिटी अक्सर कम होती है। गलत पोजिशन डेटा रनवे मिसअलाइनमेंट, ग्लाइड पाथ में गड़बड़ी या गो-अराउंड जैसी स्थितियां पैदा कर सकता है। साथ ही, यदि एक ही इलाके में कई विमानों के GPS डेटा प्रभावित हों, तो एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) के लिए वास्तविक लोकेशन पहचानना मुश्किल हो जाता है। इससे विमानों के बीच सेपरेशन कम हो सकता है और पायलट एवं ATC दोनों का वर्कलोड बढ़ जाता है। किसी अन्य इमरजेंसी की स्थिति में हादसे की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए एयरपोर्ट के आसपास GNSS सुरक्षा और विभिन्न रेडंडेंसी सिस्टम्स का इस्तेमाल जरूरी है, ताकि हवाई यात्रा सुरक्षित बनी रहे और संभावित खतरों से बचाव किया जा सके।

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