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Sunday, May 17, 2026
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UGC बिल विवाद: नीतीश कुमार की JDU बोली-किसी वर्ग के हितों से नहीं होगा समझौता

UGC के नए इक्विटी रेगुलेशन 2026 को लेकर जारी विरोध के बीच नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने संतुलित रुख अपनाते हुए न्यायपालिका के फैसले को अंतिम बताया है।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। यूजीसी बिल 2026 को लेकर नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया है। पार्टी प्रवक्ता और एमएलसी नीरज कुमार ने कहा कि देश का संविधान डॉ. भीमराव आंबेडकर ने बनाया है, जिसमें हर नागरिक को अपनी बात रखने का अधिकार दिया गया है। ऐसे में किसी भी समाजिक वर्ग में उपेक्षा या नाराजगी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हमेशा न्याय के साथ विकास और सबका सम्मान की राजनीति के रोल मॉडल रहे हैं। यूजीसी के नए रेगुलेशन को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं और अब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है, इसलिए इस पूरे विवाद में न्यायपालिका का फैसला ही सर्वोपरि होगा।

Equity Regulations 2026 पर क्यों बढ़ा विरोध?

यूजीसी की नई Equity Regulations 2026 इसी महीने लागू हुई हैं, जिनका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकना बताया गया है। लेकिन इन नियमों में OBC वर्ग को भी जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किए जाने और झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर जुर्माना, निलंबन या सजा जैसे प्रावधान हटाए जाने से विवाद गहरा गया है। सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों का कहना है कि इससे कानून के दुरुपयोग की आशंका बढ़ गई है और गलत आरोपों पर रोक लगाने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं बची है।

यूपी में सियासी पारा हाई, बीजेपी में इस्तीफे

नई गाइडलाइंस को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचते ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी हलचल तेज हो गई है। बीजेपी के कई पदाधिकारियों ने इन नियमों के विरोध में इस्तीफा दे दिया, जिससे विवाद और ज्यादा गरमा गया। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में आरोप लगाया गया है कि यूजीसी ने जाति-आधारित भेदभाव की गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई है, जिसके चलते कुछ वर्गों को संस्थागत सुरक्षा से बाहर कर दिया गया है।

कोर्ट से नियमों पर रोक की मांग

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में मांग की गई है कि यूजीसी के इन नियमों को मौजूदा स्वरूप में लागू करने पर रोक लगाई जाए और जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को जाति-तटस्थ और संविधान अनुरूप दोबारा तय किया जाए। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि भेदभाव की परिभाषा ऐसी होनी चाहिए, जिससे जाति की पहचान से परे हर पीड़ित को समान सुरक्षा मिल सके। साथ ही केंद्र सरकार और यूजीसी से अंतरिम निर्देश जारी करने की मांग की गई है, ताकि समान अवसर केंद्र और इक्विटी हेल्पलाइन जैसी व्यवस्थाएं बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए उपलब्ध कराई जा सकें।

कुल मिलाकर, यूजीसी बिल 2026 अब शिक्षा नीति से आगे बढ़कर संवैधानिक संतुलन और समान अधिकारों का बड़ा मुद्दा बन चुका है और सबकी नजरें अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी हैं।

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