स्टारकास्ट दमदार, रिस्पॉन्स कमजोर
नीरज घायवान द्वारा निर्देशित इस फिल्म में ईशान खट्टर, विशाल जेठवा और जाह्नवी कपूर जैसे युवा सितारे मुख्य भूमिकाओं में हैं।
जहां एक ओर फिल्म को कान फिल्म फेस्टिवल और टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (TIFF) जैसे प्रतिष्ठित प्लेटफॉर्म्स पर खूब सराहा गया, वहीं घरेलू दर्शकों का रुझान शुरुआती तौर पर बहुत ठंडा रहा। सिर्फ 30 लाख रुपये की ओपनिंग कमाई ने इसे ईशान खट्टर की ‘धड़क’ (8.71 करोड़) और विशाल जेठवा की ‘सलाम वेंकी’ (45 लाख) से भी पीछे कर दिया है।
फिल्म की कहानी: दोस्ती, सामाजिक संघर्ष और उम्मीद
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‘होमबाउंड’ की कहानी एक मुस्लिम और एक दलित युवक की दोस्ती पर आधारित है, जो समाज में सम्मान हासिल करने के लिए पुलिस सेवा में शामिल होने का सपना देखते हैं। यह फिल्म कोविड-19 महामारी की पृष्ठभूमि में गहराई से बुनी गई है, और जातीय भेदभाव, धार्मिक पहचान और संस्थागत असमानता जैसे मुद्दों को मार्मिक ढंग से उठाती है। फिल्म पत्रकार और लेखक बशरत पीर की कहानी ‘Taking Amrit Home’ पर आधारित है। इसकी पटकथा को लेकर आलोचकों ने विशेष सराहना की है।
अंतरराष्ट्रीय प्रशंसा: बड़े नामों का समर्थन
‘होमबाउंड’ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न केवल स्टैंडिंग ओवेशन मिला है, बल्कि इसे हॉलीवुड लीजेंड मार्टिन स्कॉर्सेसे ने भी सराहा है। फिल्म के निर्माता करण जौहर और अदार पूनावाला जैसे बड़े नाम हैं, जिनकी भागीदारी ने इसे ग्लोबल लेवल पर और अधिक मजबूती दी है।
भारत में क्यों नहीं जुड़ पाया दर्शक?
भारतीय दर्शकों की प्राथमिकताएं अब भी मुख्य रूप से मनोरंजन प्रधान, मसाला या लार्जर दैन लाइफ फिल्मों की ओर झुकी हुई हैं। ऐसे में ‘होमबाउंड’ जैसी गहराई और संवेदनशीलता से भरी फिल्म को सिनेमाघरों में वह शुरुआत नहीं मिल सकी, जिसकी उम्मीद की जा रही थी।
फिल्म विशेषज्ञ मानते हैं कि, इस तरह की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर धीमी शुरुआत करती हैं, लेकिन अगर कंटेंट मजबूत हो, तो ‘वर्ड ऑफ माउथ’ के जरिए धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ सकती हैं। इसके अलावा, महामारी के बाद थिएटर कल्चर में आई गिरावट और OTT प्लेटफॉर्म्स की बढ़ती लोकप्रियता भी ऐसी फिल्मों के लिए चुनौती बन चुकी है।
क्या आगे रफ्तार पकड़ेगी ‘होमबाउंड’?
फिल्म की संवेदनशील थीम, शानदार अभिनय और आलोचनात्मक प्रशंसा को देखते हुए उम्मीद की जा सकती है कि ‘होमबाउंड’ आने वाले दिनों में अपनी स्थिति मजबूत कर सकती है। विशेष रूप से यदि यह फिल्म शैक्षणिक संस्थानों, फिल्म फेस्टिवल्स, या सामाजिक चर्चा वाले मंचों पर दिखाई जाए, तो इसके प्रभाव और पहुंच दोनों में वृद्धि संभव है।
‘होमबाउंड’ एक ऐसी फिल्म है जो सिनेमा को सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता का माध्यम मानती है। यह फिल्म न सिर्फ भारत के लिए ऑस्कर की दावेदार है, बल्कि एक विचारशील समाज की जरूरत भी है। हालांकि, इसकी बॉक्स ऑफिस पर धीमी शुरुआत चिंता का विषय है, लेकिन ऐसे सिनेमा की सफलता सिर्फ कमाई से नहीं, बल्कि लंबे समय तक बने रहने वाले प्रभाव से मापी जाती है।




