नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। बुधवार 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट से एक ऐसा भावुक फैसला निकल कर आया जो न्यायिक इतिहास में आज तक नहीं आया था। 13 साल से अचेत अवस्था में पड़े गाजियाबाद के हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट ने इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस पूरी प्रकिया को पूरी डिग्निटी के साथ पूरा किया जाए। प्रक्रिया के लिए हरीश को AIIMS में भर्ती कराया जाएगा जहां आगे की प्रकिया को अंजाम दिया जाएगा।
भारत में क्या है प्रक्रिया?
भारत में जिस तरीके को मंजूरी मिली है उसे पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia) कहा जाता है। इसमें मरीज को कोई जहरीला इंजेक्शन या दवा देकर सीधे तौर पर नहीं मारा जाता है। इसके बजाय, मरीज को जिंदा रखने वाले जो कृत्रिम साधन हैं- जैसे वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या लाइफ सपोर्ट सिस्टम, उन्हें हटा लिया जाता है। हरीश राणा के मामले में भी इसी प्रक्रिया को अपनाया जाएगा।
विदेशों में कौन से तरीके से दी जाती है इच्छा मृत्यु?
स्विट्जरलैंड में ‘एक्टिव यूथेनेशिया’ (डॉक्टर द्वारा जहर देना) तो अवैध है, लेकिन ‘असिस्टेड सुसाइड’ को यहां कानूनी वैधता प्राप्त है। यहां का नियम है कि आखिरी कदम मरीज को खुद उठाना होगा। संस्थाएं घातक दवा (जैसे सोडियम पेंटोबार्बिटल) उपलब्ध कराती हैं, लेकिन उसे पीना या नली का वाल्व खोलना मरीज का अपना काम होता है।
नीदरलैंड और बेल्जियम वे पहले देश थे, जिन्होंने ‘एक्टिव यूथेनेशिया’ को कानूनी बनाया। यहां डॉक्टर खुद मरीज को घातक दवा का इंजेक्शन दे सकते हैं।
कनाडा में भी ‘मेडिकल असिस्टेंस इन डाइंग’ (MAID) के तहत इच्छामृत्यु का प्रावधान है। यहां भी लाइलाज बीमारी की शर्त को हटा दिया गया है, बशर्ते मरीज की स्थिति गंभीर और अपूरणीय हो। हालांकि यह प्रावधान केवल उन्हीं के लिए है जो मूलत: कनाडा के निवासी हैं।




