नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। लोकसभा की कार्यवाही के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव का माइक बंद होने का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। विपक्ष का आरोप है कि उनकी आवाज दबाने के लिए ऐसा किया जाता है, जबकि सरकार और संसदीय सचिवालय इसे नियमों और तकनीकी प्रक्रिया का हिस्सा बताते हैं।
सदन में माइक का कंट्रोल किसके पास होता है?
संसद में माइक का अंतिम नियंत्रण लोकसभा अध्यक्ष यानी स्पीकर या उस समय सदन की अध्यक्षता कर रहे पीठासीन अधिकारी के पास होता है। हालांकि, स्पीकर खुद बटन नहीं दबाते। उनके निर्देश पर तकनीकी टीम और सचिवालय के कर्मचारी माइक ऑन या ऑफ करते हैं। नियमों के अनुसार, केवल उसी सदस्य का माइक चालू किया जाता है जिसे बोलने की अनुमति दी गई हो। बिना अनुमति बोलने पर माइक चालू नहीं किया जाता। यदि कोई सदस्य नियमों के खिलाफ बात करता है तो स्पीकर माइक बंद करने का निर्देश दे सकते हैं। तय समय पूरा होने पर माइक बंद किया जा सकता है। सदन में शोर-शराबा बढ़ने पर सभी माइक बंद किए जा सकते हैं ताकि अव्यवस्था रिकॉर्ड न हो।
राहुल गांधी और अखिलेश यादव का मामला क्या है?
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान राहुल गांधी ने डोकलाम और चीन से जुड़े मुद्दों पर बात की और पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की किताब का जिक्र किया। इस पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आपत्ति जताई और स्पीकर ने किताब सदन में रखने की बात कही। बहस के दौरान जब अखिलेश यादव राहुल गांधी के समर्थन में खड़े हुए, तो कुछ देर बाद उनका माइक बंद हो गया। इसके बाद विपक्ष ने इसे लोकतंत्र की आवाज दबाने का मामला बताया। विपक्ष का कहना है कि सत्ता पक्ष को ज्यादा समय और छूट मिलती है, जबकि विपक्ष के माइक जल्दी बंद कर दिए जाते हैं। लाइव प्रसारण के दौरान जब आवाज अचानक बंद हो जाती है, तो जनता के बीच भ्रम और नाराजगी बढ़ती है। चूंकि स्पीकर अक्सर सत्ताधारी दल से आते हैं, इसलिए उनके फैसलों को राजनीतिक नजरिए से भी देखा जाता है।




