नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। संसद में माइक बंद होने को लेकर अक्सर विवाद होता रहता है। कई बार विपक्ष के नेता आरोप लगाते हैं कि उन्हें बोलने से रोकने के लिए उनका माइक बंद कर दिया जाता है। इसी विवाद के बीच Om Birla ने साफ किया है कि स्पीकर की मेज पर ऐसा कोई बटन नहीं होता जिससे वे सीधे किसी सांसद का माइक ऑन या ऑफ कर सकें। उन्होंने कहा कि संसद किसी व्यक्ति की जागीर नहीं है और यहां सभी नियम एक समान रूप से लागू होते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर संसद में माइक कंट्रोल कैसे होता है।
संसद का माइक सिस्टम कैसे काम करता है?
संसद के दोनों सदनों Lok Sabha और Rajya Sabha में माइक कंट्रोल करने के लिए एक अलग तकनीकी व्यवस्था होती है। सदन के सामने या ऊंचाई पर एक विशेष कंट्रोल चैंबर बनाया गया होता है। यहां प्रशिक्षित साउंड टेक्नीशियन बैठते हैं। कांच की दीवार के जरिए वे पूरे सदन की गतिविधियों को देखते रहते हैं और वहीं से माइक को कंट्रोल करते हैं। ये टेक्नीशियन संसद सचिवालय के अधिकारी होते हैं, किसी राजनीतिक दल से उनका कोई संबंध नहीं होता।
सीट नंबर से जुड़ा होता है हर माइक्रोफोन
संसद में हर सांसद की सीट तय होती है और हर सीट पर एक माइक्रोफोन लगा होता है। इन माइक्रोफोन का एक अलग नंबर होता है, जो कंट्रोल चैंबर के इलेक्ट्रॉनिक बोर्ड से जुड़ा रहता है। जब किसी सांसद को बोलने की अनुमति मिलती है, तब टेक्नीशियन उसी सीट का माइक ऑन करते हैं। अगर कोई सांसद अपनी सीट छोड़कर दूसरी जगह से बोलने की कोशिश करता है, तो वहां से आवाज रिकॉर्ड नहीं होती क्योंकि माइक उसी सीट से जुड़ा होता है।
माइक ऑन और ऑफ करने के क्या नियम हैं?
संसद की कार्यवाही नियमों के अनुसार चलती है। माइक तभी ऑन होता है जब स्पीकर किसी सांसद का नाम लेकर उसे बोलने की अनुमति देते हैं। अगर कोई सांसद बिना अनुमति के बोलना शुरू कर देता है, तो उसका माइक चालू नहीं किया जाता। शून्यकाल या अन्य चर्चाओं में बोलने के लिए अक्सर सीमित समय दिया जाता है, जैसे तीन मिनट। समय खत्म होने के बाद माइक बंद हो सकता है ताकि दूसरे सांसदों को भी बोलने का मौका मिले।
स्पीकर के निर्देश कितने महत्वपूर्ण होते हैं?
हालांकि स्पीकर के पास खुद माइक का बटन नहीं होता, लेकिन साउंड टेक्नीशियन स्पीकर के निर्देशों का पालन करते हैं। अगर सदन में हंगामा हो रहा हो या कोई सांसद असंसदीय भाषा का इस्तेमाल कर रहा हो, तो स्पीकर निर्देश दे सकते हैं कि उस सदस्य की बात रिकॉर्ड में न ली जाए। ऐसी स्थिति में टेक्नीशियन माइक बंद कर देते हैं।
क्या माइक अपने-आप भी बंद हो सकता है?
कई मामलों में माइक ऑटोमैटिक तरीके से भी बंद हो जाता है। कुछ बहसों में सांसदों को तय समय या शब्द सीमा के अंदर अपनी बात रखनी होती है। जैसे ही डिजिटल टाइमर खत्म होता है, सिस्टम उस सीट की आवाज को अपने-आप बंद कर देता है। इसका मकसद किसी को रोकना नहीं बल्कि सदन के समय का सही प्रबंधन करना होता है ताकि सभी सांसदों को बोलने का अवसर मिल सके।





