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Wednesday, March 18, 2026
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वसुंधरा-शिवराज की तरह फडणवीस को इग्नोर क्यों नहीं कर पाई BJP? ये है फडणवीस को ही CM बनाने की असली वजह

देवेंद्र फडणवीस तीसरी बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनेंगे। वह 5 दिसंबर को पद और गोपनीयता की शपथ लेंगे। उनके साथ दो उपमुख्यमंत्री शपथ ले सकते हैं।

नई दिल्‍ली / रफ्तार डेस्‍क । महाराष्ट्र में नई सरकार के गठन का रास्ता साफ हो गया है। इसके साथ ही इस सस्पेंस से भी पर्दा उठ गया है कि महाराष्ट्र का नया मुख्यमंत्री कौन होगा? भाजपा के वरिष्ठ नेता देवेंद्र फडणवीस ही महाराष्ट्र के अगले मुख्यमंत्री होंगे। बुधवार को हुई भाजपा विधायक दल की बैठक में उनके नाम पर मुहर लग गई है। अब मुंबई के आजाद मैदान में गुरुवार, 5 दिसंबर की शाम 5.30 बजे शपथ ग्रहण होगा, जिसमें विधायक दल के नेता चुने गए देवेन्द्र फडणवीस तीसरी बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण करेंगे। गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आयोजित होने वाले शपथ ग्रहण समारोह में शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे और एनसीपी के अजित पवार के उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेने की संभावना है।

हालांकि, इससे पहले अटकलें लगाई जा रही थीं कि भाजपा इस बार महाराष्ट्र में मराठा चेहरे पर दांव लगा सकती है, क्योंकि विधानसभा चुनाव में महायुति गठबंधन को इस वर्ग ने बढ़-चढ़कर समर्थन दिया है, लेकिन भाजपा ने अगड़े वर्ग से आने वाले फडणवीस को ही महाराष्ट्र का नया मुख्यमंत्री घोषित कर भाजपा ने इन अटकलों पर भी विराम लगा दिया है।

ऐसे में यह सवाल उठना भी लाजिमी है कि महाराष्ट्र में भाजपा ने मध्य प्रदेश, राजस्थान या हरियाणा वाला फॉर्मूला क्यों लागू लागू नहीं किया? दरअसल, मध्य प्रदेश और राजस्थान में पिछले साल विधानसभा चुनाव हुए थे। इन दोनों राज्यों में भाजपा ने जीत के बाद मुख्यमंत्री बदल दिया था। एमपी में जहां शिवराज सिंह चौहान को बदलकर उनकी जगह ओबीसी चेहरे मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया है, तो वहीं राजस्थान में पूर्व सीएम वसुंधरा राजे की बजाए ब्राह्मण चेहरे भजन लाल शर्मा पर दांव खेला है। इसी तरह हरियाणा में भी इसी साल विधानसभा चुनाव से पांच महीने पहले ही भाजपा ने तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को बदल दिया था और उनकी जगह पिछड़े वर्ग से आने वाले नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री बना दिया था। इन तीनों ही राज्यों में अपनाए गए फॉर्मूले को महाराष्ट्र में लागू नहीं करके भाजपा ने सामान्य वर्ग को बड़ा संदेश दिया है। यहां से ब्राह्मण चेहरे पर दांव खेला गया है।

https://twitter.com/BJP4Maharashtra/status/1864220156299497882

फडणवीस को मुख्यमंत्री बनाए जाने के मायने 10 पॉइंट में समझें…..

1. एक वकील के रूप में प्रशिक्षित और एक प्रतिबद्ध आरएसएस सदस्य, देवेंद्र फडणवीस ने महाराष्ट्र में अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की, जहाँ उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता और तीक्ष्ण बहस कौशल के लिए ख्याति अर्जित की। नागपुर दक्षिण पश्चिम निर्वाचन क्षेत्र से उनकी लगातार छह जीतें। इस क्षेत्र में उनकी स्थायी लोकप्रियता को दर्शाती है। उन्हें सरकार से लेकर संगठन तक में काम करने का अनुभव है। महाराष्ट्र की राजनीति में फडणवीस ने खुद को न केवल स्थापित किया है, बल्कि उन्होंने हर वर्ग में अपनी पैठ बनाई है। अगर भाजपा महाराष्ट्र की राजनीति में नए चेहरे पर दांव लगाती तो उसके लिए क्षेत्रीय क्षत्रपों को साधना असंभव हो जाता।

2. महज 27 साल की उम्र में देवेंद्र फडणवीस नागपुर के सबसे युवा मेयर बने और बाद में महाराष्ट्र के दूसरे ब्राह्मण मुख्यमंत्री बने। उन्होंने राज्य की राजनीति की जटिलताओं को उल्लेखनीय संयम के साथ संभाला। अपने प्रचार के दौरान फडणवीस ने आरएसएस के संयुक्त महासचिव अतुल लिमये के साथ मिलकर काम किया और मतदाताओं से जुड़ने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नारे “एक हैं तो सेफ हैं” का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया। मौलाना सज्जाद नोमानी की “वोट जिहाद” टिप्पणी के जवाब में उन्होंने हिंदू मतदाताओं को संगठित किया और चुनावों को “धर्म युद्ध” के रूप में पेश किया।

3. देवेन्द्र फडणवीस पहली बार 2014 में मुख्यमंत्री बने और उन्होंने 2019 तक महाराष्ट्र में इस पद का सफलतापूर्वक निर्वहन किया। इसके बाद लगातार दूसरी बार उन्होंने अक्टूबर 2019 में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। हालांकि, तीन दिन बाद उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर इस्तीफा देना पड़ा था। दरअसल, 2019 में विधानसभा चुनाव में जीत के बाद जब राजनीतिक उलटफेर हुआ और उद्धव ठाकरे ने एनडीए का साथ छोड़ दिया, तब फडणवीस मजबूती से डटे रहे और यह साबित कर पाने में सफल रहे कि भाजपा ने चुनाव से पहले सीएम को लेकर उद्धव ठाकरे से ऐसा कोई वादा नहीं किया था।

4. देवेन्द्र फडणवीस की नेतृत्व शैली ने उन्हें व्यापक सम्मान दिलाया। 2014 में मुख्यमंत्री के रूप में उनका पहला कार्यकाल मराठा आरक्षण मुद्दे जैसी प्रमुख चुनौतियों को संबोधित करने, मुंबई-नागपुर समृद्धि महामार्ग जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को शुरू करने और पुलिस सुधारों की शुरुआत करने के लिए जाना जाता था। फडणवीस ने सिंचाई घोटाले को उजागर कर अपनी साख को और मजबूत किया, जिससे भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए उनकी प्रतिबद्धता का पता चलता है। उनके नेतृत्व में, महाराष्ट्र ने महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे का विकास देखा, और जल युक्त शिवार जैसी पहलों ने पूरे राज्य में जल प्रबंधन को बदल दिया।

5. देवेन्द्र फडणवीस की असली अग्नि परीक्षा तब शुरू हुई, जब 2019 में भाजपा का साथ छोड़ने वाले उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में महाविकास अघाड़ी ने सरकार बनाई। उस दौरान फडणवीस ने नेता विपक्ष की भूमिका भी बड़ी सूझबूझ से निभाई। उन्होंने कोरोनाकाल में उद्धव सरकार के खिलाफ अव्यवस्थाओं से लेकर भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों तक में खुलकर मोर्चा खोला और महाराष्ट्र में भाजपा के सर्वमान्य नेता के रूप पर खुद को स्थापित किया। उनके नेता प्रतिपक्ष रहते हुए कई बार ऐसे मौके भी आए, जब उद्धव सरकार बैकफुट पर नजर आई।

6. देवेन्द्र फडणवीस के पास खुद को साबित करने का एक मौका साल 2022 में फिर आया, जब शिवसेना टूट गई। एकनाथ शिंदे का गुट उद्धव ठाकरे के गुट से अलग हो गया और एनडीए का हिस्सा बन गया। इसके बाद देवेन्द्र फडणवीस ने अपना पूरा फोकस राज्य में महायुति की सरकार बनाने पर केन्द्रीय कर दिया। उन्होंने खुद को पीछे रखकर विधायकों को न केवल एक सूत्र में बांधे रखा, बल्कि मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बनी सरकार में उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई।

7. महाराष्ट्र में भाजपा को 2019 के विधानसभा चुनाव में 105 सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन 2022 में हुए उलटफेर के बाद जब महाराष्ट्र में एनडीए सरकार बनी तो भाजपा के केवल 10 विधायकों को मंत्री बनाया गया, शिवसेना शिंदे गुट के पास केवल 40 विधायक थे, लेकिन सरकार में शिवसेना का कोटा भी भाजपा के बराबर रहा और उसके 10 विधायकों को मंत्री पद दिया गया। ऐसे में फडणवीस के सामने अपने विधायकों को साधकर रखने की बड़ी चुनौती थी, क्योंकि सरकार में वे ही बड़े चेहरे थे। उन्होंने अपनी यह जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन करते हुए भाजपा विधायकों को तो साधकर रखा ही, एकनाथ शिंदे के साथ सरकार चलाने में भी बराबर साथ दिया।

8. देवेन्द्र फडणवीस को 2023 में भी पार्टी को एकजुट करने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। दरअसल, जुलाई 2013 में अजित पवार अपने 42 विधायकों के साथ एनडीए में शामिल हो गए। उस समय फडणवीस ने ही सरकार में सामंजस्य बैठाते हुए पावर शेयरिंग के फॉर्मूले पर अजित पवार गुट के नौ विधायकों को राज्य कैबिनेट में मंत्री बनाने का रास्ता निकाला। इस दौरान बड़ी बात यह भी देखने को मिली कि कैबिनेट से भाजपा और शिवसेना के किसी भी मंत्री को बाहर का रास्ता नहीं दिखाया गया। इस दौरान अजित गुट के मंत्रियों के लिए भाजपा को सबसे ज्यादा मंत्रालय छोड़ने पड़े।

9. इसी साल के शुरुआत में हुए लोकसभा चुनाव में हालांकि महाराष्ट्र में भाजपा ज्यादा कमाल नहीं दिखा सकी। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने मात्र नौ सीटें जीती थीं, जबकि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को महाराष्ट्र में 23 सीटें मिली थी। इस लिहाज से लोकसभा चुनाव में भाजपा को बड़ा नुकसान हुआ था और फिर छह महीने के बाद ही यहां विधानसभा चुनाव भी होने थे। ऐसे में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती सत्ता में वापसी की थी। शिंदे के नेतृत्व में महायुति सरकार ने जनता के मूड भांपते हुए अपनी रणनीति बदली और राज्य सरकार लाडकी बहिण जैसी गेमचेंजर योजनाएं लागू कर दी, जिसका फायदा महायुति सरकार को मिला। भाजपा ने इस योजना के दम पर महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा सीटों पर जीत हासिल की।

10. विधानसभा चुनाव में भी सीट महायुति गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर बड़ी चुनौती थी। शिवसेना-एनसीपी में क्षेत्रीय से लेकर जातीय समीकरणों तक को ध्यान में रखना और स्थानीय क्षत्रपों की नाराजगी को भी दूर करना, मराठा बनाम ओबीसी आरक्षण की मांग आदि चुनौतियों से निपटने का रास्ता भी फडणवीस ने निकाला और स्थानीय स्तर पर महायुति गठबंधन सहमति बनाकर चुनाव मैदान में उतरा और बड़ी जीत हासिल कर महाविकास अघाड़ी सिर्फ 49 सीटों पर समेट दिया। महाराष्ट्र में 23 नवंबर को विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने पर भाजपा सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी रही।

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