नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। आज है उस सुरों की साधिका का जन्मदिन, जिनकी मधुर आवाज़ ने बिहार की मिट्टी की सुगंध को देश और दुनिया तक पहुंचाया। 1 अक्टूबर 1952 को बिहार के सुपौल जिले के हुलास गांव में जन्मीं शारदा सिन्हा आज होतीं तो 73 वर्ष की होतीं। हालांकि अब वो हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी विरासत, उनके गीत और उनका संघर्ष आज भी संगीत प्रेमियों को प्रेरित करता है। वह बिहार की जानी-मानी लोक गायिका थीं और अपने मैथिली, भोजपुरी और मगही गीतों के लिए प्रसिद्ध थीं। उन्होंने लोकभाषाओं को अपनी आवाज़ से राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया।
बचपन से संगीत की साधना
शारदा सिन्हा को संगीत से लगाव बचपन से ही था। उनके पिता सुखदेव ठाकुर ने इस लगाव को पहचाना और घर पर ही एक संगीत शिक्षक की व्यवस्था की। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय और प्रयाग संगीत समिति से संगीत की औपचारिक शिक्षा प्राप्त की। बाद में पटना विश्वविद्यालय में संगीत की प्रोफेसर बनीं।
छठ गीतों को दी अंतरराष्ट्रीय पहचान
छठ पूजा के गीतों को एक भक्ति और परंपरा से भरी पहचान दिलाने का श्रेय अगर किसी को जाता है, तो वह हैं शारदा सिन्हा। उनके गाए गीत, पहिले-पहिल छठी मइया, केलवा के पात पर उगेलन सूरज मल झुके झुके, उग हो सूरज देव, छठ पर्व के साथ अब परंपरा की तरह जुड़ चुके हैं। उन्होंने 62 छठ गीतों को रिकॉर्ड कर 9 एल्बम निकाले, जो आज भी बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और प्रवासी भारतीयों के बीच लोकप्रिय हैं।
बॉलीवुड में भी दिखाया हुनर
शारदा सिन्हा ने लोकगायन के साथ-साथ बॉलीवुड में भी अपनी छवि बनाई जहां उन्होंने 1989 में सलमान खान की पहली फिल्म “मैंने प्यार किया” के लिए गाना गाया था। कहे तोसे सजना जिसकी फीस उन्हें सिर्फ 76 रुपये मिली थी। बाद में उन्होंने, हम आपके हैं कौन का बाबुल जो तुमने सिखाया, गैंग्स ऑफ वासेपुर का तार बिजली से पतले हमारे पिया, जैसे हिट गीत भी गाए।
सम्मान और पुरस्कार
पद्म श्री (1991)
पद्म भूषण (2018)
बिहार रत्न
राष्ट्रीय लोक संगीत सम्मान
इन सम्मानों से नवाजी गईं शारदा सिन्हा को हर मंच पर लोकगायन की शान माना गया।
व्यक्तिगत जीवन
शारदा जी की शादी बेगूसराय के ब्रजकिशोर सिन्हा से हुई थी। उनके दो संतानें हैं, शादी के बाद कुछ समय के लिए उन्हें संगीत छोड़ने की सलाह मिली, लेकिन उनके पति उनके सबसे बड़े सहयोगी बने। बचपन से ही संगीत के प्रति गहरी लगन रखने वाली शारदा सिन्हा को उनके पिता सुखदेव ठाकुर ने घर पर ही संगीत की प्रारंभिक शिक्षा दिलवाई। उस दौर में जब लड़कियों का मंच पर आना आम नहीं था, तब शारदा जी सुरों की दुनिया में अपने रास्ते तलाश रही थीं।
शादी के बाद शुरुआती दिनों में उन्हें संगीत को जारी रखने में कई सामाजिक और पारिवारिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। लेकिन सौभाग्यवश, उनके पति ब्रजकिशोर सिन्हा न केवल उनके जीवनसाथी बने, बल्कि उनके सबसे बड़े सपोर्ट सिस्टम भी साबित हुए। उन्होंने हर मोड़ पर शारदा जी का हौसला बढ़ाया और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उनका पहला बड़ा मौका तब आया जब उन्होंने लखनऊ के बर्लिंगटन होटल स्थित एचएमवी स्टूडियो में ऑडिशन दिया। यहां उन्होंने जब “द्वार के छेकाई ए भइया” गीत गाया, तो मौजूद सभी लोग उनकी भावपूर्ण गायकी से मंत्रमुग्ध हो गए। और यहीं से शुरू हुआ एक ऐसा संगीत सफर, जो लोकगीतों को लोकमन तक पहुंचाने वाला आंदोलन बन गया।
अब सिर्फ गीतों में रहेंगी ज़िंदा
बता दे कि, 5 नवंबर 2024 को दिल्ली AIIMS में उनका निधन हो गया, उन्हें सेप्टिसीमिया की वजह से उन्हें रिफ्रैक्टरी शॉक आया था। जहां उनके निधन के बाद उनकी अंतिम विदाई पर पूरे देश ने उन्हें श्रद्धांजलि दी थी। साथ ही बिहार राज्य से होने के नाते बिहार सरकार ने उन्हें राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी थी। शारदा सिन्हा केवल नाम नहीं, वह एक संस्कृति हैं। उनकी आवाज़ अब हर साल छठ घाटों पर अमर रहेगी।




