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Wednesday, April 8, 2026
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भारत को समझने के लिए सिख परम्परा एवं इसके गौरवपूर्ण इतिहास को जानें : प्रो. कौशल

वाराणसी, 19 फरवरी (हि.स.)। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के सामाजिक विज्ञान विभाग के संकायध्यक्ष प्रो.कौशल किशोर मिश्र ने शुक्रवार को कहा कि भारत को यदि जानना है तो सिख परम्परा एवं इसके गौरवपूर्ण इतिहास को समझना होगा। समाज के लिए बलिदान को सदैव अपनी स्मृतियों मे बनाये रखना ही हमारी संस्कृति है। प्रो. मिश्र सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के योग साधना केन्द्र में श्री सद्गुरु राम सिंह महाराज पीठ के तत्वावधान में आयोजित "धर्म एवं राजनीति का अन्त: सम्बंध: सिख परम्परा के विशेष संदर्भ में" विशेष व्याख्यान को बतौर मुख्य वक्ता सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि महाराज राम सिंह जी ने भारतीय संस्कृति की रक्षा एवं अध्यात्मिक चेतना जागृत करने के लिये जो कार्य किये, उसी से आज हम हैं।प्रो. मिश्र ने कहा कि महाराज के पूरे काल को देखने से ऐसा प्रतीत होता है की राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को उन्हीं से प्रेरणा प्राप्त हुई। राम सिंह महाराज की सर्वप्रथम आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना थी। उन्होंने भारतीय ज्ञान परम्परा को क्रिया के बिना अधूरा बताया। प्रो. मिश्र ने व्याख्यान माला में नामधारी परम्परा पर शोध करने की आवश्यकता पर बल दिया। व्याख्यान में मुख्य अतिथि राष्ट्रीय सिख संगत, नई दिल्ली के हरभजन सिंह दिओल (कविजी) ने कहा कि महाराज राम सिंह के द्वारा सामाजिक उत्थान में चलाये गये सभी कार्यक्रमों का दूरगामी परिणाम पंजाब प्रांत मे दिखाई देता है। उन्होंने काव्य के माध्यम से महाराज के व्यक्तित्व और दर्शन को बताया। व्याख्यान माला में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि महापुरुषों एवं ऋषियों का आगमन किसी विशेष महत्वपूर्ण ऊद्देश्य की सम्पूर्ती के लिये ही होता है। हमें सदैव उनके अतीत को स्मरण करते हुये उनके आदर्श भाव को स्वीकार करना चाहिये। कुलपति ने कहा कि ऋषि एवं सन्त सदैव जन एवं राष्ट्र कल्याण की भावना से चलते हैं। वे सदैव दूसरों के दुखों से दुखी हो, उन्हें दुख से मुक्त मार्ग देते हैं। इसके पहले पीठ की संयोजक एवं व्याख्यान माला की संचालक डॉ रेणु द्विवेदी और प्रो. हरिप्रसाद अधिकारी ने अतिथियों का स्वागत किया। व्याख्यान माला में प्रो.सुधाकर मिश्र, प्रो. महेंद्र पान्डेय, प्रो. शैलेश मिश्र, प्रो. राघवेंद्र दुबे, डॉ. विजय पान्डेय भी मौजूद रहे। हिन्दुस्थान समाचार/श्रीधर/दीपक

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