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Wednesday, March 11, 2026
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National Sports Day: मेजर ध्यानचंद को क्यों कहा गया ‘हॉकी का जादूगर’, इनके नाम का डाक टिकट भी हो चुका है जारी

आज देश हॉकी के दिग्गज खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद के जन्मदिन के मौके पर राष्ट्रीय खेल दिवस मना रहा है। उन्हें हॉकी का जादूगर भी कहा जाता है। आइए राष्ट्रीय खेल दिवस और इनके इतिहास को जानें।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। राष्ट्रीय खेल दिवस हर साल 29 अगस्त को मनाया जाता है। हमारे देश में कई बड़े खिलाड़ी हुए हैं। इनमें प्रमुख नाम पीटी ऊषा, सचिन तेंदुलकर और मेजर ध्यानचंद जैसे न जाने कितने और प्रतिष्ठित नाम हैं। लेकिन आज का दिन पूरी तरह से मेजर ध्यानचंद को समर्पित है। इस दिन को मेजर ध्यानचंद को इसलिए समर्पित किया गया है क्योंकि आज उनका जन्मदिन होता है। मेजर ध्यानचंद जी का नाम खेल के क्षेत्र में बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है।

मेजर ध्यानचंद का प्रारंभिक जीवन

मशहूर खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद 29 अगस्त 1905 को प्रयागराज, उत्तर प्रदेश में जन्में थे। प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद ध्यानचंद सेना में भर्ती होना चाहते थे। 1922 में वह समय आया जब वह सिपाही के तौर पर सेना में भर्ती हो गए। शुरुआती दौर में तो उनकी हॉकी में रुचि नहीं थी। समय बीतने के साथ उनके साथी सूबेदार मेजर तिवारी के कहने पर उन्होंने हॉकी खेलना शुरू किया। वह खुद भी एक खेल प्रेमी थे।

मेजर ध्यानचंद खेल में कुशल कैसे होते गए

मेजर ध्यानचंद हॉकी खेलकर इतने कुशल हो गए कि लोगों को लगने लगा था कि उनकी हॉकी स्टिक में कुछ तो विशेष है। ऐसा इसलिए माना जाने लगा क्योंकि जब भी कोई गेंद उनकी स्टिक में आती थी फिर गोल होना लगभग लगभग तय माना जाता था। जब इस बात पर शक गहराता गया तो उनकी हॉकी स्टिक की जांच की गई। उनकी स्टिक को तोड़कर जांचा गया कि कहीं उनकी स्टिक में कोई चुंबक तो नहीं लगी है। हॉकी में उनकी इसी कुशलता को देखते हुए 1927 में लांस नायक नियुक्त किया गया था। 1932 में उन्हें नायक के पद पर पदोन्नत कर दिया गया था, इसके ठीक 4 साल बाद 1936 में सूबेदार पद ससम्मान दिया गया था। हालांकि अंत में वो कैप्टन के पद तक पहुंचे।

मेजर ध्यानचंद को समर्पित है खेल दिवस

भारत में कई नामचीन खिलाड़ी हुए हैं जिन्होंने अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया है। उन्हीं में से एक हुए मेजर ध्यानचंद, जिन्होंने हॉकी को फर्श से अर्श तक पहुंचा दिया। उनके इसी योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने 2012 में यह घोषणा की, कि मेजर ध्यानचंद के जन्मदिन को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाएगा। उन्होंने 1926 से 1948 तक अपने खेल करियर में 400 से ज्याद गोल किए जबकि कुल गोल की संख्या 1000 तक पहुंच गई थी। 

भारत सरकार से सम्मानित

राष्ट्रीय खेल दिवस राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है। इसका आयोजन हर साल राष्ट्रपति भवन में किया जाता है और भारत के राष्ट्रपति देश के महान खिलाड़ियों को राष्ट्रीय खेल पुरस्कार देते हैं। राष्ट्रीय खेल दिवस के अवसर पर राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार, अर्जुन पुरस्कार के साथ साथ ध्यानचंद पुरस्कार भी दिया जाता है। 1979 में मेजर ध्यानचंद की याद में भारतीय डाक विभाग ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किए थे। उनको श्रद्धांजलि देने के लिए दिल्ली में राष्ट्रीय स्टेडियम का नाम बदलकर मेजर ध्यानचंद स्टेडियम स्टेडियम कर दिया गया।

राष्ट्रीय खेल दिवस क्यों मनाया जाता है?

राष्ट्रीय खेल दिवस का मुख्य उद्देश्य है खेलों को महत्व देना और रोजमर्रा के जीवन में शारीरिक रूप से सक्रिय रहने के बारे में जागरूकता बढ़ाने देना है। भारत सरकार राष्ट्रीय खेल दिवस को जागरुकता बढ़ाने के लिए विभिन्न कार्यक्रम व सेमिनार आदि का भी आयोजन कराती है।

जब ठुकरा दिया था हिटलर का प्रस्ताव

यह बात है साल 1936 बर्लिन ओलंपिक की, जब जर्मनी के खिलाफ हुए मुकाबले में भारत ने उनके खिलाफ 8-1 से जीत दर्ज की थी। मैच के दौरान मेजर ध्यानचंद की खेल कुशलता से जर्मनी का तानाशाह हिटलर उनका प्रशंसक हो गया था। मैच के बाद मेजर ध्यानचंद की मुलाकात हिटलर के साथ तय हुई। हिटलर ने उन्हें अपनी सेना में प्रतिष्ठित पद का प्रस्ताव दिया। मेजर ध्यानचंद ने हिटलर के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

हॉकी को कब कहा अलविदा

हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के बारे में कई किस्से मशहूर हैं। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा बटोरी बर्लिन ओलंपिक से जुड़े किस्से ने। बर्लिन ओलंपिक में भारतीय टीम ने लगातार तीसरी बार गोल्ड मेडल पर कब्जा किया। बर्लिन ओलंपिक में गोल्ड जीतकर भारतीय टीम ने मेजर ध्यानचंद को तोहफा दिया था, क्योंकि इसके बाद उन्होंने सन्यास की घोषणा कर दी थी। 

बर्लिन ओलंपिक ने भारतीय टीम बाकी सभी टीमों पर हावी रही। इस टूर्नामेंट में भारतीय टीम ने नाम 30 गोल रहे। वहीं हंगरी, जापान, फ्रांस और यूएसए जैसी टीमें भारत के खिलाफ लीग मैच में एक भी गोल करने में नाकाम रही। सेमीफाइनल और फाइनल मुकाबले में ध्यानचंद और उनके छोटे भाई रूपचंद के शानदार प्रदर्शन की बदौलत दोनों मैच भारतीय टीम ने अपने खाते में डाल लिए। बर्लिन ओलंपिक का फाइनल मुकाबला भारत और जर्मनी के बीच खेला जा रहा था। पूरे मैच के दौरान भारतीय टीम जर्मनी पर हावी रही और अंत में जर्मनी की टीम को 8-1 से हराकर भारतीय टीम ने स्वर्ण पदक पर कब्जा कर लिया। इसी के साथ ध्यानचंद ने गोल्ड मेडल के साथ हॉकी को अलविदा कह लिया।

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