नई दिल्ली, रफ्तार न्यूज। 13 सालों के बाद भी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का ‘मां, माटी, मानुष’ का नारा लोगों के बीच लोकप्रिय बना हुआ है। 2024 के लोकसभा चुनावों में भी ममता बनर्जी ने BJP को कड़ी चुनौती दी। न तो ‘संदेशखाली’ का मुद्दा चला और न ही नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का। ममता बनर्जी ने अकेले ही BJP के इन दोनों मुद्दों का सफलतापूर्वक सामना किया। जिस तरह अखिलेश यादव और राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में मिलकर बीजेपी का मुकाबला किया, उससे भी बेहतर तरीके से ममता बनर्जी ने बंगाल में अकेले ही किया।
दीदी का ‘एकला चलो रे’ मंत्र
ममता बनर्जी ने इंडिया गठबंधन के किसी भी दल के साथ सीट शेयरिंग नहीं की। उन्हें विश्वास था कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) बंगाल में अकेले ही काफी है। यदि ममता बनर्जी कांग्रेस के साथ चुनाव लड़तीं, तो कई मुद्दों पर उन्हें कांग्रेस का नैतिक समर्थन लेना पड़ता, जो उनके लिए नुकसानदायक होता। राहुल गांधी लगातार जातिगत जनगणना की मांग कर रहे थे, जबकि बंगाल में OBC पॉलिटिक्स अभी उतनी मजबूत नहीं है। यहां OBC आरक्षण भी सिर्फ 17 प्रतिशत ही है, जबकि अधिकतम 27 प्रतिशत आरक्षण होना चाहिए। ममता को यह भी पता था कि अगर कांग्रेस को ज्यादा सीटें दी गईं, तो पार्टी फिर से मजबूत हो सकती है। इसीलिए उन्होंने कांग्रेस को सिर्फ 2 सीटों की पेशकश की थी।
गठबंधन न करने के फैसले से कांग्रेस को सिर्फ एक सीट पर संतोष करना पड़ा, जबकि TMC को कम से कम 6 सीटों का फायदा हुआ, जो BJP के पास थीं। ममता बनर्जी ने यह भी साबित कर दिया कि कांग्रेस को 2 सीट देकर वे उस पर एहसान ही कर रही थीं।
मजबूत संगठन का फायदा
पश्चिम बंगाल में जिस पार्टी का संगठन मजबूत होता है, वही चुनाव जीतती है। पहले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने बंगाल में करीब 22 साल तक शासन किया था, क्योंकि उनके पार्टी कार्यालय गांव-गांव में मजबूती से स्थापित थे, जैसे आज TMC के हैं। इन कार्यालयों में पार्टी के नेता जनता के रोजमर्रा के मामलों से लेकर पारिवारिक विवादों तक का निपटारा करते हैं, जिससे पार्टी का स्थानीय स्तर पर मजबूत संपर्क बनता है।
TMC ने भी गांव-गांव में अपने कार्यालय स्थापित किए हैं, जहां लोग अपने छोटे-मोटे काम करवाने के लिए आते हैं। जब तक BJP स्थानीय स्तर पर इस तरह की पकड़ नहीं बना पाती, तब तक बंगाल में जीत पाना उनके लिए मुश्किल है।
मां, माटी, मानुष’ की ताकत
ममता बनर्जी ने ‘मां, माटी, मानुष’ का नारा देकर बंगाल में वाम मोर्चे की सरकार को हटाने में सफलता पाई। इस नारे का मतलब है- मातृभूमि (मां), अपनी जमीन (माटी), और अपनी जनता (मानुष)। ममता बनर्जी ने इस नारे का हर चुनाव में जोर-शोर से उपयोग किया है। इस नारे ने बंगाल में बीजेपी के मुद्दों जैसे ‘संदेशखाली’ और ‘CAA-UCC’ को असरहीन बना दिया। बशीरहाट लोकसभा सीट, जहां से बीजेपी की उम्मीदवार रेखा पात्रा ने चुनाव लड़ा था, वहां भी इस नारे की वजह से BJP कोई प्रभाव नहीं डाल पाई।
जनता की नब्ज समझने की कला
ममता बनर्जी के पास बंगाल की जनता की नब्ज समझने की अद्भुत क्षमता है। बंगाल में ममता बनर्जी के अलावा कोई और नेता नहीं है, जो जनता की सोच को इतनी अच्छी तरह से समझता हो। इसी वजह से BJP को बार-बार यहां हार का सामना करना पड़ रहा है। TMC में कभी नंबर दो के नेता रहे सुवेंदु अधिकारी भी बंगाल को उतना नहीं समझते, जितना ममता बनर्जी। अगर ऐसा नहीं होता तो BJP विधानसभा चुनाव और फिर स्थानीय निकाय चुनावों में हार नहीं मानती।
CAA के खिलाफ रणनीति
ममता बनर्जी ने चुनाव प्रचार के दौरान CAA का जोरदार विरोध किया। उन्होंने कहा था कि जब तक वे जीवित हैं, कोई भी सरकार बंगाल में CAA लागू नहीं कर पाएगी। उनके इस बयान के बाद यह माना जा रहा था कि उन्हें कुछ क्षेत्रों में नुकसान हो सकता है, क्योंकि बंगाल में राजवंशी और मतुआ समुदाय की संख्या काफी है। पर ऐसा नहीं हुआ। चुनाव से पहले केंद्र सरकार ने CAA को लेकर अधिसूचना जारी की थी, ताकि बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने का वादा करके चुनाव में फायदा उठाया जा सके।
लेकिन चुनाव परिणाम ने साबित कर दिया कि बंगाल में दीदी के आगे शरणार्थियों को नागरिकता, मतुआ को नागरिकता और घुसपैठ का मुद्दा ज्यादा प्रभाव नहीं डाल पाया। बीजेपी पिछली बार इसी मुद्दे पर उत्तर बंगाल में बढ़त बनाने में सफल रही थी, लेकिन इस बार उसे यहां भी झटका लगा है। केंद्र में मंत्री निशिथ प्रमाणिक भी चुनाव हार गए हैं। राजवंशी समुदाय के नेता अनंत महाराज को BJP ने राज्यसभा में सांसद बनाया, लेकिन इसका भी कोई असर नहीं हुआ।
ममता बनर्जी ने बंगाल में अपनी रणनीति और जनता के बीच मजबूत पकड़ की वजह से 2024 के लोकसभा चुनाव में BJP को कड़ी शिकस्त दी है। उनकी रणनीति और नारे ‘मां, माटी, मानुष’ की ताकत ने साबित कर दिया है कि बंगाल में BJP के लिए रास्ता आसान नहीं है।





