नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। हाल के दिनों में दो बड़े नेताओं Nitish Kumar और Raghav Chadha को मिली अलग-अलग सुरक्षा श्रेणियों ने इस मुद्दे को चर्चा में ला दिया है। जहां नीतीश कुमार को Z+ सुरक्षा दी गई है, वहीं राघव चड्ढा को Z श्रेणी की सुरक्षा मिली है।
VIP सुरक्षा कैसे तय होती है?
भारत में VIP सुरक्षा का फैसला गृह मंत्रालय द्वारा किया जाता है। यह फैसला खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट के आधार पर लिया जाता है, जिसमें किसी व्यक्ति को संभावित खतरे का आकलन किया जाता है।
Z+ और Z सुरक्षा में सबसे बड़ा अंतर
दोनों सुरक्षा श्रेणियों में सबसे बड़ा फर्क सुरक्षाकर्मियों की संख्या और उनकी क्षमता में होता है। Z+ सुरक्षा इसमें लगभग 55 सुरक्षाकर्मी तैनात होते हैं। इनमें 10 या उससे ज्यादा कमांडो शामिल होते हैं। यह देश की सबसे मजबूत सुरक्षा श्रेणियों में से एक है। Z सुरक्षा में करीब 22 सुरक्षाकर्मी होते हैं। कमांडो की संख्या Z+ के मुकाबले कम होती है।
किन बलों के जवान रहते हैं तैनात?
Z+ सुरक्षा में अक्सर NSG (नेशनल सिक्योरिटी गार्ड) के कमांडो शामिल होते हैं, जिन्हें ब्लैक कैट कहा जाता है। ये हाई-रिस्क ऑपरेशन और आतंकवाद-रोधी मिशनों में एक्सपर्ट होते हैं। Z सुरक्षा: इसमें CRPF, CISF या ITBP जैसे अर्धसैनिक बलों के जवान तैनात किए जाते हैं।
काफिला और यात्रा सुरक्षा में अंतर
Z+ सुरक्षा वाले व्यक्ति के काफिले में 5 से 6 गाड़ियां होती हैं, जिनमें बुलेटप्रूफ कार, पायलट वाहन और जैमर युक्त वाहन शामिल होते हैं। यात्रा से पहले पूरे रूट की गहन जांच की जाती है। Z सुरक्षा इसमें काफिला छोटा होता है, आमतौर पर एक एस्कॉर्ट वाहन और कुछ अन्य गाड़ियां होती हैं। जांच केवल संवेदनशील मौकों पर ही की जाती है। Z+ सुरक्षा में VIP के पहुंचने से पहले सुरक्षा एजेंसियां पूरे इलाके की एडवांस जांच करती हैं। इसे एडवांस सिक्योरिटी लायजन कहा जाता है। वहीं Z सुरक्षा में यह प्रक्रिया हर बार नहीं होती, केवल जरूरत पड़ने पर ही की जाती है।
Z+ सुरक्षा कितनी खास है?
Z+ सुरक्षा, SPG सुरक्षा (जो प्रधानमंत्री को मिलती है) से एक स्तर नीचे मानी जाती है। यह देश की सबसे मजबूत सुरक्षा व्यवस्थाओं में से एक है। वहीं Z श्रेणी की सुरक्षा भी काफी मजबूत होती है, लेकिन यह Z+ से एक स्तर नीचे आती है। सीधे शब्दों में समझें तो Z+ सुरक्षा ज्यादा हाई-लेवल और एडवांस होती है, जबकि Z सुरक्षा भी मजबूत है लेकिन उसमें संसाधन और तैयारी थोड़ी कम होती है। इसी वजह से खतरे के स्तर के आधार पर नेताओं को अलग-अलग सुरक्षा दी जाती है।




