नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। भारत के प्रसिद्ध उद्योगपति रतन टाटा का 9 अक्टूबर 2024 की रात को निधन हो गया। जैसे ही उनके निधन की खबर मीडिया में आई तो पूरे देश में शोक की लहर फैल गई। रतन टाटा कोई साधारण इंसान नहीं थे, उनका हर एक कार्य राष्ट्रहित के लिए होता था। जहां अधिकतर उधोगपति व्यापार में अपना मुनाफा देखते हैं। वहीं रतन टाटा अपने बिजनेस के माध्यम से समाज सेवा का कार्य करते थे। यही कारण है कि उनकी अंतिम यात्रा में देश-विदेश की जानी-मानी हस्तियां भी मौजूद रही और अन्य लोग मीडिया के माध्यम से पूरे दिन रतन टाटा से जुड़ी खबरे देखते रहे।
प्यार के लिए दुख की कीमत चुकानी पड़ती है
वहीं रतन टाटा के अंतिम यात्रा में उनके एक बहुत ही नौजवान मित्र शांतनु नायडू भी शामिल हुए, वह आगे आगे चल रहे थे। शांतनु नायडू रत्न टाटा के बहुत ही करीबी माने जाते थे। जब शांतनु नायडू रतन टाटा की अंतिम यात्रा में शामिल हुए तो पूरी मीडिया का उनपर भी ध्यान केन्द्रित रहा। शांतनु नायडू का 10 अक्टूबर 2024 की सुबह लिंक्डइन पर एक इमोशन पोस्ट भी खूब वायरल हो रहा है। जिसमे उन्होंने लिखा “इस दोस्ती ने अब मुझमें जो ख़ालीपन छोड़ दिया है, उसे भरने में मैं अपनी बाकी ज़िंदगी बिता दूंगा। प्यार के लिए दुख की कीमत चुकानी पड़ती है। अलविदा, मेरे प्रिय लाइटहाउस”
रतन टाटा शांतनु नायडू की प्रतिभा के कायल थे
शांतनु नायडू का जन्म वर्ष 1993 में महाराष्ट्र के पुणे जिले में हुआ था। रतन टाटा शांतनु नायडू की प्रतिभा के कायल थे। जिसको देखते हुए रतन टाटा ने खुद शांतनु नायडू को फोन करके उन्हें असिस्टेंट बनने का ऑफर दे डाला था। जिसको शांतनु नायडू ने तुरंत स्वीकार कर लिया था। इसके बाद शांतनु नायडू को वर्ष 2022 में रतन टाटा के ऑफिस में जनरल मेनेजर की जिम्मेदारी भी सौपी गयी, जिसको वह बखूबी निभाते हुए आ रहे हैं। शांतनु नायडू रतन टाटा को स्टार्टअप्स में निवेश के लिए अपनी सलाह भी दिया करते थे। बता दें कि शांतनु नायडू ने वर्ष 2014 में सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की थी। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2016 में कॉर्नेल जॉनसन ग्रेजुएट स्कूल ऑफ मैनेजमेंट से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर की डिग्री पूरी की थी।
शांतनु नायडू को फ़ोन करके असिस्टेंट बनने का ऑफर दे डाला
अब बात करते हैं कि शांतनु नायडू औररतन टाटा की दोस्ती की शुरुआत कैसे हुई। दरअसल दोनों ही एनिमल लवर हैं। इनकी मुलाकात वर्ष 2014 में हुई थी। शांतनु नायडू ने रिफ्लेक्टिव कॉलर बनाकर आवारा कुत्तों के गले में लगाते थे, जिससे रात के समय में आवारा कुत्तों के एक्सीडेंट में कमी आई। जब कुत्ते रात के समय में सड़क से गुजरते थे, तो ड्राइवरों को उनके गले में लगा हुआ रिफ्लेक्टिव कॉलर चमकते हुए दिखाई देने लगता था, जिससे वह अपनी गाड़ी को धीमा कर लेते थे। रतन टाटा इससे काफी प्रभावित हुए और कुछ समय बाद उन्होंने शांतनु नायडू को फ़ोन करके असिस्टेंट बनने का ऑफर दे डाला। तब से लेकर शांतनु नायडू टाटा समूह के साथ जुड़े हुए हैं। जब रतन टाटा की शांतनु से दोस्ती हुई थी, उस समय शांतनु की उम्र सिर्फ 20 वर्ष की ही थी।




