नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । भारत और पाकिस्तान के सैन्य संचालन महानिदेशकों (DGMOs) के बीच आज एक महत्वपूर्ण बातचीत होनी प्रस्तावित थी। यह वार्ता हाल ही में दोनों देशों के बीच सीजफायर समझौते के बाद पहली औपचारिक बातचीत रही। यह संवाद दोनों देशों के सैन्य मुख्यालयों के बीच स्थापित एक सुरक्षित ‘हॉटलाइन’ प्रणाली के माध्यम से होता है।
दरअसल, यह हॉटलाइन भारत के नई दिल्ली स्थित सेना मुख्यालय को पाकिस्तान के रावलपिंडी स्थित जनरल मुख्यालय से जोड़ती है। इस प्रणाली की शुरुआत 1971 के युद्ध के बाद की गई थी। यह व्यवस्था अमेरिका और रूस के बीच शीत युद्ध के दौरान इस्तेमाल की गई ‘हॉटलाइन’ की तर्ज पर तैयार की गई है, जिसका उद्देश्य है संकट की स्थिति में तुरंत संवाद स्थापित करना, समाधान ढूंढ़ना और तनाव के हालात में तत्काल जानकारी साझा करना।
हॉटलाइन क्या होती है?
यह कोई मोबाइल या इंटरनेट आधारित सुविधा नहीं है, बल्कि एक स्थायी, एन्क्रिप्टेड और सुरक्षित लैंडलाइन कनेक्शन है, जो केवल भारत और पाकिस्तान के DGMOs के कार्यालयों से संचालित होता है। इसमें न तो राजनीतिक हस्तक्षेप होता है और न ही राजनायिक दखल। इसका मुख्य उद्देश्य किसी भी सैन्य घटना के दौरान त्वरित और स्पष्ट संवाद सुनिश्चित करना है। आमतौर पर इस हॉटलाइन का उपयोग सप्ताह में एक बार, मंगलवार को किया जाता है, लेकिन यदि सीमा पर गोलीबारी, सैन्य तनाव या किसी आपात स्थिति की स्थिति बनती है, तो इसे तुरंत सक्रिय कर दिया जाता है।
यह वार्ता ऐसे समय में हो रही है जब सीमा पर परिस्थितियां एक बार फिर संवेदनशील बनी हुई हैं। दोनों देशों ने इस बातचीत के माध्यम से सीजफायर समझौते की पुनः पुष्टि की, सैनिकों की तैनाती पर विचार-विमर्श किया और भविष्य में किसी भी संकट से निपटने के लिए एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझने की कोशिश की।
कब हुई थी हॉटलाइन की शुरुआत ?
अगर इतिहास पर नजर डालें तो शुरुआत में यह हॉटलाइन केवल संकट की स्थितियों में ही सक्रिय की जाती थी। हालांकि समय के साथ इसका उपयोग सामान्य सैन्य प्रबंधन, सीजफायर की निगरानी, सैन्य अभ्यास की सूचना साझा करने और 1998 में दोनों देशों द्वारा किए गए परमाणु परीक्षणों के दौरान सूचनाओं के आदान-प्रदान जैसे मामलों में भी होने लगा। इस बातचीत के दौरान पाकिस्तानी सेना ने द्विपक्षीय स्थिरता और आपसी सम्मान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, वहीं भारत ने स्पष्ट किया कि धमकियों की भाषा से कोई समाधान नहीं निकलता। दोनों देशों ने यह भी माना कि संकट की घड़ी में यह हॉटलाइन संवाद का सबसे पहला और विश्वसनीय माध्यम बनी है।




