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Friday, March 13, 2026
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भारी कीमत चुकाने को तैयार रहें… CJI सूर्यकांत की जयराम रमेश को फटकार, सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यसभा सांसद जयराम रमेश को फटकार लगाई है। सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने कांग्रेस सांसद जयराम रमेश की याचिका सुनने से इनकार कर दिया।

नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश की याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने याचिका पर नाराजगी जताते हुए कड़ी टिप्पणी की और कहा कि अगर आरोप गलत साबित हुए तो भारी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहें।

क्या है पूरा मामला?

जयराम रमेश ने केंद्र सरकार के उस कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) को चुनौती दी थी, जिसमें एक्स-पोस्ट फैक्टो एनवायरमेंटल क्लीयरेंस (EC) यानी बाद में दी जाने वाली पर्यावरणीय मंजूरी से जुड़ा प्रावधान शामिल है। यह मंजूरी उन परियोजनाओं को दी जाती है, जो बिना पहले से जरूरी पर्यावरणीय स्वीकृति लिए शुरू हो चुकी हों।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों जताई नाराजगी?

सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने पूछा कि जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही वनशक्ति रिव्यू जजमेंट में इस मुद्दे पर फैसला दे चुका है, तो उसी फैसले से जुड़े ऑफिस मेमोरेंडम को रिट याचिका के जरिए कैसे चुनौती दी जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि यह कदम फैसले को अप्रत्यक्ष रूप से चुनौती देने जैसा है। कोर्ट ने जयराम रमेश से कहा, “आप एक जिम्मेदार नेता हैं। अगर यह गलत साबित हुआ तो इसकी भारी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहें। हम इसके पीछे की साजिश जानते हैं, अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह की याचिकाएं सिर्फ मीडिया में चर्चा के लिए लगती हैं।

जुर्माने की चेतावनी के बाद याचिका वापस

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर भारी जुर्माना लगाने की चेतावनी दी। इसके बाद जयराम रमेश की ओर से याचिका वापस लेने का फैसला किया गया। कोर्ट ने साफ किया कि कार्यालय ज्ञापन सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने के लिए जारी किया गया है। यह ऐसी पर्यावरणीय मंजूरी होती है, जो किसी प्रोजेक्ट के शुरू होने के बाद दी जाती है। आमतौर पर नियम यह है कि परियोजना शुरू करने से पहले पर्यावरणीय अनुमति लेना जरूरी होता है, लेकिन कुछ मामलों में बाद में भी मंजूरी दी जाती है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद इस मामले की राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा तेज हो गई है। अदालत की तल्ख टिप्पणी और याचिका वापस लेने के फैसले ने इस मुद्दे को और सुर्खियों में ला दिया है।

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