नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर सियासी गर्मी बढ़ने लगी है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बसपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री दद्दू प्रसाद को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया है। माना जा रहा है कि यह कदम दलितों को साधने के लिए बनाई गई सपा की PDA पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक रणनीति का अहम हिस्सा है। और दद्दू प्रसाद, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान मानिकपुर सीट पर सपा का चेहरा हो सकते हैं। प्रसाद यहां से पूर्व विधायक भी रह चुके हैं।
कौन हैं दद्दू प्रसाद?
दद्दू प्रसाद ने 1982 में दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (DS-4) से राजनीति में कदम रखा था। वह चित्रकूट जिले के मानिकपुर सुरक्षित विधानसभा सीट से तीन बार बसपा के टिकट पर विधायक रह चुके हैं। 2007 में मायावती सरकार में उन्हें ग्राम्य विकास मंत्री बनाया गया था। इसके बाद पार्टी से मतभेदों के चलते वे बसपा से दूर होते गए।
PDA रणनीति को मिलेगी मजबूती
अखिलेश यादव लगातार PDA फार्मूले के तहत पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों को एकजुट करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। ऐसे में दद्दू प्रसाद जैसे कद्दावर दलित नेता की सपा में एंट्री पार्टी को इस दिशा में मजबूती देगी। प्रेस कॉन्फ्रेंस में अखिलेश ने दद्दू प्रसाद और उनके साथियों का स्वागत करते हुए कहा कि ये सभी PDA की लड़ाई को और आगे ले जाएंगे। एक समय मायावती की करीबी टीम में शामिल रहे इंद्रजीत सरोज, बाबू सिंह कुशवाहा और अब दद्दू प्रसाद जैसे नेता सपा में आ चुके हैं। इसके अलावा सलाउद्दीन (नगर पालिका अध्यक्ष), देवरंजन नागर बुलंदशहर, और जगन्नाथ कुशवाहा भी सपा का हिस्सा बन चुके हैं। यह बसपा के लिए एक बड़ा झटका और सपा के लिए अहम बढ़त मानी जा रही है।
अखिलेश का योगी सरकार पर हमला
प्रेस वार्ता के दौरान अखिलेश यादव ने राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन के घर हुए हमले का जिक्र करते हुए कहा कि यदि उन्हें कुछ हुआ तो इसकी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की होगी। अखिलेश ने तंज कसते हुए कहा कि आज हालात ये हैं कि अगर दद्दू प्रसाद किसी मंदिर चले जाएं तो पूरा मंदिर धुलवाया जाता है। उन्होंने खुद के अनुभव साझा करते हुए भाजपा पर हमला बोला। दद्दू प्रसाद का सपा में शामिल होना उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है। दलित मतों को साधने के लिए समाजवादी पार्टी ने यह कदम उठाया है, जिसका सीधा असर 2027 के चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है।




