नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। आज सुप्रीम कोर्ट ने SC-ST आरक्षण मामले में सुनवाई की। जिसमें उसने अनुसूचित जातियों व जनजातियों के भीतर सब कैटेगरी बनाने की राज्यों को अनुमति दे दी है। इस मामले में सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति पंकज मिथल ने गुरुवार को कहा कि आरक्षण किसी श्रेणी में पहली पीढ़ी के लिए होना चाहिये। आरक्षण की समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिये, ताकि ये पता लगाया जा सके कि दूसरी पीढ़ी सामान्य लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है या नहीं।
गौरतलब है कि 7 जजों की संविधान पीठ ने 6:1 बहुमत से माना कि SC-ST को उप-वर्गीकृत करना जरूरी है। जस्टिस बेला त्रिवेदी को छोड़कर बाकी सभी जज इसके पक्ष में थे।
SC के फैसले से मुख्य निष्कर्ष
- आरक्षित श्रेणियों में उप-वर्गीकरण स्वीकार्य है: सर्वोच्च न्यायालय के बहुमत के फैसले में कहा गया
- सुप्रीम कोर्ट ने ईवी चिन्नैया फैसले को खारिज किया
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एससी/एसटी को एक समान नहीं माना जा सकता
- सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उप-वर्गीकरण तभी संभव है जब इसका समर्थन मात्रात्मक आंकड़ों से हो।
- केंद्र और राज्यों को अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के आरक्षित वर्ग में सबसे पिछड़े वर्गों को चिन्हित करने की अनुमति है: सुप्रीम कोर्ट
ईवी चिन्नैया मामले में दिए गए फैसले को SC ने किया खारिज
इस फैसले ने ईवी चिन्नैया मामले में दिए गए फैसले को भी खारिज कर दिया है। दरअसल ईवी चिन्नैया मामले में जस्टिस एन संतोष हेगड़े, एसएन बरियावा, बीपी सिंह, एसबी सिन्हां और एचके सेमा की पीठ ने माना था कि संविधान के अनुच्छेद 341 (1) के तहत राष्ट्रपति के आदेश में शामिल सभी जातियां एक ही वर्ग का समरूप हैं। उन्हें विभाजित नहीं किया जा सकता है।
अब भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा है कि अब ये ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह स्थापित हो चुका है कि राष्ट्रपति के द्वारा अधिसूचित अनुसूचित जाति एक अलग वर्ग है ना कि समरूप वर्ग हैं।
न्यायमूर्ति पंकज मिथल ने क्या कहा ?
न्यायमूर्ति पंकज मिथल ने कहा कि आरक्षण किसी वर्ग में केवल पहली पीढ़ी के लिए होना चाहिये। यदि दूसरी पीढ़ी आ गई है तो आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाना चाहिये। यह राज्य को देखना चाहिये कि आरक्षण के बाद भी दूसरी पीढ़ी समान्य वर्ग के बराबर आ गई है कि नहीं।
इस संबंध में चीफ जस्टिस DY चंद्रचूड़ ने क्या कहा ?
चीफ जस्टिस ने कहा कि ऐतिहासिक साक्ष्यों से पता चला है कि दलित वर्ग समरूप वर्ग नहीं था और सभी वर्गों के लिए सामाजिक स्थितियां एक समान नहीं हैं। मध्य प्रदेश का उदाहरण देते हुए चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि मध्य प्रदेश में 25 जातियों में से केवल 9 जातियां ही अनुसूचित जातियां हैं।
न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी ने क्या कहा?
वहीं इस फैसले से असहमत एकमात्र न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी ने कहा कि मैं इस फैसले से असहमत हूं। जिस तरह से 3 जजों की बेंच ने बिना कोई कारण बताये मामले को बड़ी बेंच को भेज दिया। मैं उससे असहमत हूं। जस्टिस बेला त्रिवेदी ने आगे कहा कि तीन जजों की बेंच ने बिना कोई कारण बताये एक रहस्यमई और औपचारिक आदेश पारित कर दिया। इस मामले में ईवी चिन्नैया पर पुनर्विचार करने का संदर्भ बिना किसी कारण के दिया गया वह भी फैसले के 15 साल बाद। यह संदर्भ ही गलत था।
राज्य आरक्षण की आड़ में राष्ट्रपति की सूची में नहीं कर सकते छेड़छाड़
इसके अलावा जस्टिस बेला त्रिवेदी ने कहा कि कार्यकारी या विधाई शक्ति के अभाव में राज्य जातियों को उप-वर्गीकृत नहीं कर सकते। इसके अलावा अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित लाभों को उप वर्गीकृत करने की उनमें क्षमता नहीं है। जस्टिस त्रिवेदी ने आगे कहा कि राज्य आरक्षण देने की आड़ में राष्ट्रपति की सूची में छेड़छाड़ नहीं कर सकते।
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