नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। कांग्रेस, DMK, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच के जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई की मांग करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को नोटिस सौंपा है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि न्यायाधीश का आचरण न्यायपालिका की निष्पक्षता, पारदर्शिता और धर्मनिरपेक्ष कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
विपक्षी दलों ने नोटिस में कहा है कि ऐसा प्रतीत होता है कि इस मामले से जुड़े सीनियर एडवोकेट एम. श्रीचरण रंगनाथन को अनुचित लाभ दिया गया और साथ ही एक विशेष समुदाय के अधिवक्ताओं का पक्ष भी लिया गया। इसके अलावा, यह आरोप भी लगाया गया है कि न्यायाधीश ने विशेष राजनीतिक विचारधारा के आधार पर फैसले दिए, जो भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के खिलाफ हैं।
नोटिस सौंपने के दौरान कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा, SP अध्यक्ष अखिलेश यादव, DMK नेता टी.आर. बालू सहित अन्य नेताओं ने हिस्सा लिया। इस नोटिस पर 107 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए।
वहीं, विवाद का केंद्र कार्तिगई दीपम मामले से जुड़ा है। तमिलनाडु के तिरुपरमकुंद्रम में दरगाह के पास स्थित अरुलमिघु सुब्रमणिय स्वामी मंदिर में परंपरागत दीप जलाने की अनुमति के लिए मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने 4 दिसंबर को जिला कलेक्टर और पुलिस आयुक्त की अपील खारिज करते हुए श्रद्धालुओं को दीप जलाने की अनुमति दी। इसके पहले, 3 दिसंबर को एकल न्यायाधीश ने श्रद्धालुओं को स्वयं दीप जलाने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए CISF को तैनात करने का आदेश दिया था।
इस फैसले के बाद तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। विपक्ष का आरोप है कि इस फैसले के बाद भाजपा द्वारा सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की कोशिश की गई। वामपंथी दलों ने भी इस मुद्दे पर मदुरै सांसद सु. वेंकटेशन की निंदा की।इस बीच, महाभियोग की प्रक्रिया को लेकर अब राजनीतिक हलकों में गहन चर्चाएं शुरू हो गई हैं। इस फैसले के बाद तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। विपक्ष का आरोप है कि भाजपा द्वारा सांप्रदायिक तनाव फैलाने की कोशिश की गई। वामपंथी दलों ने भी इस मुद्दे पर मदुरै सांसद सु. वेंकटेशन की कड़ी निंदा की।
इस पूरे मामले ने न सिर्फ न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं बल्कि राजनीतिक हलकों में महाभियोग को लेकर गहन चर्चाओं को भी जन्म दिया है। अब देश की नजरें इस प्रक्रिया पर टिकी हैं कि लोकतंत्र की तीसरी स्तंभ की प्रतिष्ठा को कैसे बचाया जाएगा।




