back to top
29.1 C
New Delhi
Thursday, March 12, 2026
spot_imgspot_imgspot_imgspot_img

‘शरीर पर निशान नहीं तो रेप नहीं?’ 1979 के शर्मनाक फैसले पर CJI गवई बोले, ये न्यायपालिका के लिए शर्म की बात थी

CJI बी आर गवई ने कहा, 1979 का रेप केस न्याय व्यवस्था के लिए सबसे पीड़ादायक क्षण था, जिसने कानून में बदलाव की राह खोली और महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई को नई दिशा दी।

नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) भूषण रामकृष्ण गवई ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि 1979 में आया एक रेप केस का फैसला भारतीय न्यायपालिका के इतिहास का सबसे शर्मनाक पल था, जब कोर्ट उसी महिला की गरिमा की रक्षा नहीं कर सका, जिसकी रक्षा करना उसका सबसे बड़ा दायित्व था। CJI गवई ने यह बात 30वें सुनंदा भंडारे मेमोरियल लेक्चर में कही। उन्होंने कहा कि यह केस क्रिमिनल लॉ में सुधार की दिशा में एक टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।

क्या था 1979 का मामला?

यह मामला एक आदिवासी लड़की के साथ पुलिस थाने में रेप से जुड़ा था। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने दो पुलिसकर्मियों को बरी कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि लड़की के शरीर पर कोई चोट या निशान नहीं मिले, जिससे यह साबित नहीं होता कि उसके साथ जबरदस्ती की गई थी। फैसले में यह भी कहा गया था कि लड़की ने सहमति से संबंध बनाए इसलिए इसे रेप नहीं माना जा सकता। इस निर्णय से पूरे देश में गुस्सा और विरोध फैल गया था।

CJI गवई ने क्या कहा?

CJI गवई ने कहा,“मेरे विचार में यह फैसला भारत के संस्थागत और न्यायिक इतिहास का सबसे परेशान करने वाला क्षण था। न्याय व्यवस्था उसी की गरिमा की रक्षा नहीं कर सकी, जिसकी रक्षा उसका उद्देश्य था। उन्होंने आगे कहा कि यह फैसला भले ही शर्मनाक था, लेकिन इसने पूरे देश में महिला अधिकारों के लिए बड़ा आंदोलन खड़ा किया। लोगों ने कोर्ट को जवाबदेह बनाया, जिससे आगे जाकर कई जरूरी कानूनी बदलाव हुए।

कानून में क्या बदला इसके बाद?

1979 के इस फैसले के बाद सरकार और समाज दोनों ने मिलकर कानून में बड़े सुधार किए। सहमति (Consent) की परिभाषा को फिर से तय किया गया। कस्टोडियल रेप (हिरासत में रेप) के मामलों के लिए सख्त सजा तय की गई। महिलाओं की सुरक्षा और न्याय के लिए कई नए कानून बनाए गए।

महिलाओं की स्थिति में बदलाव

CJI गवई ने कहा कि इस घटना के बाद महिला अधिकार आंदोलन मजबूत हुआ। उन्होंने बताया कि न्यायपालिका ने भी बाद के वर्षों में महिलाओं की समानता, गरिमा और सुरक्षा के लिए कई ऐतिहासिक फैसले दिए। अब महिलाएं समाज के किनारे नहीं, बल्कि संवैधानिक नागरिकता के केंद्र में हैं,” उन्होंने कहा। 1979 का यह फैसला आज भी न्यायपालिका के लिए एक सीख और आत्ममंथन का प्रतीक है। मुख्य न्यायाधीश का बयान इस बात की याद दिलाता है कि न्याय सिर्फ कानून की किताबों में नहीं, बल्कि संवेदना और समानता में बसता है।

Advertisementspot_img

Also Read:

भारत में क्या है इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया? विदेशों से कितनी अलग है पूरी प्रक्रिया

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। बुधवार 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट से एक ऐसा भावुक फैसला निकल कर आया जो न्यायिक इतिहास में आज तक नहीं...
spot_img

Latest Stories

रेवती नाम का मतलब-Revati Name Meaning

Meaning of Revati / रेवती नाम का मतलब :...

Chaitra Navratri 2026: नवरात्रि से पहले घर लाएं ये चीजें, दूर होंगी कंगाली

नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। चैत्र नवरात्रि में माता रानी...

फारूक अब्दुल्ला पर हुई फायरिंग को लेकर टेंशन में गुलाम नबी आजाद, गंभीर जांच की मांग की

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। बुधवार की रात जम्मू कश्मीर के...

पेट्रोल-डीजल और गैस की किल्लत पर सरकार का एक्शन, अमित शाह की अध्यक्षता में कमिटी बनाई

नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। देश में पेट्रोल, डीजल और रसोई...

गर्मियां शुरू होने से पहले घूम आएं ये जगहें, मार्च में घूमने के लिए हैं बेस्ट

नई दिल्ली रफ्तार डेस्क। मार्च के महीने में न...

इच्छामृत्यु पर बनी इन फिल्मों को देखकर रह जाएंगे हैरान, जानिए लिस्ट

नई दिल्ली रफ्तार डेस्क। आपको बता दें कि, इस...