नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। बिश्नोई समुदाय का पर्यावरण के प्रति बड़ी आस्था है। इस समुदाय के लोग पर्यावरण की सुरक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगाने से भी नहीं चूकते हैं। ऐसा इनका इतिहास रहा है। मीडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1730 में खेजड़ी नरसंहार को बिश्नोई गांव में अंजाम दिया गया था, जो कि राजस्थान के जोधपुर से लगभग 25 किलोमीटर दूर है। दरअसल, जोधपुर के महाराजा को अपने महल के निर्माण के लिए लकड़ी की आवश्यकता थी। जिसके लिए उन्होंने अपने मंत्री को बिश्नोई गांव के पास खेजड़ी के पेड़ों के एक उपवन काटने का आदेश दिया।
सैनिकों ने कुल्हाड़ी से तीनों को काटकर मार डाला
लेकिन जब जोधपुर के महाराजा के सैनिक बिश्नोई गांव के पास उपवन से खेजड़ी के पेड़ काटने की कोशिश करने लगे तो बिश्नोई समुदाय की एक महिला अमृता देवी ने इसका कड़ा विरोध किया और पेड़ से लिपट गई।अमृता देवी को देखकर उनकी दो बेटी भी उस पेड़ से लिपट गयी थी। महाराजा के सैनिकों ने गुस्से में आकर कुल्हाड़ी अमृता देवी और उनकी दोनों बेटियों की तरफ कर डाली थी लेकिन वे फिर भी नहीं डरे। अमृता देवी ने अपनी हत्या से पहले सैनिकों से कहा कि “सर संताय रूंख रहे तो भी सस्ती जान (कटा हुआ सिर कटे हुए पेड़ से सस्ता है)”, यह सुनते ही सैनिकों ने कुल्हाड़ी से तीनों को काटकर मार डाला।
363 पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को भी मौत के घाट उतार डाला
जैसी ही यह खबर बिश्नोई समुदाय में आग की तरह फैली, तो 83 गांवों के पुरुष, महिलाएं और बच्चे भी पर्यावरण की रक्षा के लिए वहां पहुंच गए और खेजड़ी के पेड़ो से लिपट गए। लेकिन सैनिकों ने जोधपुर के महाराजा के आदेश का पालन करने की चक्कर में करीब 363 पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को भी मौत के घाट उतार डाला। बता दें कि इसी घटना को खेजरली नरसंहार के नाम से जाना जाता है। मीडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार इतिहास के विशेषज्ञ 1970 के दशक के चिपको आंदोलन को इसी से प्रेरित मानते हैं। कुछ इस तरह का है, बिश्नोई समुदाय का पर्यावरण के प्रति लगाव। यही कारण है कि काले हिरणों की हत्या को लेकर सलमान खान पर लगे आरोपों से बिश्नोई समुदाय में काफी नाराजगी है।





