नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। अमेरिका के बाद अब फ्रांस में आर्थिक नीतियों के खिलाफ जनता का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा है। महंगाई, सामाजिक योजनाओं में कटौती और अमीरों पर टैक्स बढ़ाने की मांग को लेकर देशभर में जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुए। हालात इतने बिगड़े कि राजधानी पेरिस में एफिल टावर जैसे विश्व प्रसिद्ध स्थल को भी बंद करना पड़ा। बता दे, गुरुवार को फ्रांस के 200 से अधिक शहरों और कस्बों में हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतरे। कामगारों, सेवानिवृत्त नागरिकों और छात्रों से लेकर आम जनता तक ने सरकार की खर्चों में कटौती वाली नीति का विरोध किया।
पेरिस में उबाल: एफिल टावर भी बंद, सड़कों पर जनसैलाब
प्रदर्शनकारियों ने पेरिस के प्लेस द’इटली से विशाल मार्च निकाला। भारी संख्या में जुटे लोगों के नारों और बैनरों से राजधानी की सड़कें गूंज उठीं। इस हड़ताल का व्यापक असर देखने को मिला, जिसके चलते एफिल टावर को पर्यटकों के लिए अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा। प्रशासन ने पुष्टि की कि हड़ताल के चलते स्मारक का संचालन संभव नहीं हो पाया।
यूनियनों की चेतावनी: अमीरों पर टैक्स बढ़ाओ, गरीबों की योजनाएं बचाओ
इस विरोध प्रदर्शन की अगुवाई देश की बड़ी ट्रेड यूनियनों ने की। यूनियनों ने सरकार को दो टूक चेतावनी देते हुए कहा कि यदि सामाजिक कल्याण योजनाओं में कटौती की गई, तो आंदोलन और तेज होगा। यूनियनों का साफ कहना है कि बजट घाटे की भरपाई गरीबों से नहीं, अमीरों से की जाए इसके लिए ऊंची आमदनी वालों पर अतिरिक्त टैक्स लगाया जाए।
नई सरकार की अग्निपरीक्षा
गौरतलब है कि फ्रांस के नए प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू हाल ही में सत्ता में आए हैं। लेकिन न तो उन्होंने अपनी पूरी कैबिनेट घोषित की है और न ही बजट को लेकर ठोस दिशा दी है। ऐसे में जनता का गुस्सा अब सीधे-सीधे नई सरकार की नीतियों पर आकर टिक गया है। माना जा रहा है कि बजट को लेकर संसद में साल के अंत तक बड़ी बहस हो सकती है।
इस जनांदोलन ने लेकोर्नू सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। साफ है कि जनता अब किसी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं है और यह सिर्फ शुरुआत हो सकती है।
सूत्रों के अनुसार, लेकोर्नू जल्द ही अपने मंत्रियों की घोषणा करेंगे और संसद में वर्षांत तक बजट पर बहस की तैयारी चल रही है। लेकिन उससे पहले ही ट्रेड यूनियनों और आम जनता के विरोध प्रदर्शन सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं।
खर्च में कटौती पर नाराजगी
सरकार द्वारा संभावित खर्च कटौती के संकेत मिलते ही विरोध तेज हो गया है। जनता और कर्मचारी संगठनों ने दो टूक कह दिया है कि वे किसी भी प्रकार की कटौती के खिलाफ हैं। सड़कों पर उतरते लोगों का आक्रोश साफ दिखा रहा है कि नई सरकार को बिना सामाजिक संतुलन के कोई निर्णय लेना भारी पड़ सकता है।
राजनीतिक असमंजस का दौर
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सरकार पूरी तरह से गठित नहीं होती और बजट की दिशा साफ नहीं होती, तब तक देश में राजनीतिक अनिश्चितता बनी रहेगी। लेकोर्नू को न केवल आर्थिक मोर्चे पर संतुलन साधना है, बल्कि सार्वजनिक भरोसा जीतना भी उनके सामने एक बड़ी कसौटी है।





