नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । भारतीय सिनेमा के बहुमुखी कलाकार परेश रावल आज अपना 70वां जन्मदिन मना रहे हैं। अभिनय की दुनिया में उन्होंने हर रंग को बड़ी सहजता से जिया है। कभी ‘बाबू भैया’ बनकर पेट पकड़कर हंसने पर मजबूर कर देते हैं, तो कभी ‘कांजी भाई’ की गहराई भरी बातों से सोचने को मजबूर कर देते हैं। परेश रावल की खासियत यही है कि वे किसी भी किरदार में पूरी तरह ढल जाते हैं, फिर चाहे वह कॉमेडी हो, विलेन का खौफनाक रूप हो, या फिर सरदार वल्लभभाई पटेल जैसा ऐतिहासिक किरदार। परेश रावल का फिल्मी सफर किरदारों की विविधता से सजा हुआ है और हर भूमिका में उन्होंने अपनी खास छाप छोड़ी है। आइये जानते हैं उनके फिल्मी कैरियर के बारें में…
सिनेमा के हर रंग में ढले परेश रावल
प्रसिद्ध अभिनेता परेश रावल का जन्म 1955 में मुंबई में हुआ था। हालांकि आज वे हिंदी सिनेमा का एक जाना-पहचाना चेहरा हैं, लेकिन उनके अभिनय की शुरुआत गुजराती फिल्म ‘नसीब नी बलिहारी’ (1982) से हुई थी। इसके दो साल बाद उन्होंने बॉलीवुड में कदम रखा फिल्म ‘होली’ (1984) के जरिए। जिस तरह होली रंगों का त्योहार है, उसी तरह परेश रावल का फिल्मी सफर भी रंग-बिरंगे किरदारों से सजा है। हर रोल में एक अलग अंदाज, एक अलग तेवर। वे सिर्फ हिंदी ही नहीं, बल्कि गुजराती, मराठी और तेलुगु फिल्मों में भी अपनी दमदार अदाकारी का परिचय दे चुके हैं। भाषाएं बदलीं, लेकिन उनके अभिनय की गहराई और विविधता हमेशा बनी रही।
फिल्मों से पहले की बैंक की नौकरी
परेश रावल ने अभिनय की दुनिया में कदम रखने से पहले बैंक ऑफ बड़ौदा में नौकरी की थी। लेकिन किस्मत ने उन्हें बड़े पर्दे की ओर मोड़ दिया। निजी जीवन की बात करें तो उन्होंने 1987 में स्वरूप संपत से विवाह किया, जो मिस इंडिया रह चुकी हैं। इस खूबसूरत रिश्ते की शुरुआत कॉलेज के दिनों में हुई थी और दोनों ने लगभग 12 साल तक एक-दूसरे को डेट करने के बाद शादी की। उनके दो बेटे हैं आदित्य और अनिरुद्ध।
सिनेमा के अलावा परेश रावल ने टेलीविजन की दुनिया में भी अपनी खास पहचान बनाई। उन्होंने ‘लागी तुझसे लगन’, ‘तीन बहू रानियां’ जैसे धारावाहिकों में भी यादगार अभिनय किया। एक अभिनेता के रूप में सफल करियर के बाद उन्होंने राजनीति में भी कदम रखा और 2014 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के टिकट पर अहमदाबाद पूर्व सीट से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे।
परेश रावल को कई पुरस्कार मिल चुके
परेश रावल का नाम केवल दमदार अभिनय का पर्याय नहीं है, बल्कि यह उस कलाकार का प्रतीक है जिसे हर किरदार में जीवंतता लाने की कला आती है। अपने बेहतरीन अभिनय के लिए उन्हें अब तक कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। साल 1994 में फिल्म ‘वो छोकरी’ में उनके शानदार प्रदर्शन के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। यह उनके टैलेंट को राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहली बड़ी मान्यता थी। इससे पहले, 1993 में आई फिल्म ‘सर’ के लिए उन्हें फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ खलनायक पुरस्कार मिला था, जिसने यह साबित कर दिया कि वे नकारात्मक भूमिकाओं में भी गहरी छाप छोड़ सकते हैं।
परेश रावल की कॉमिक टाइमिंग की मिसाल बनी 2000 की सुपरहिट फिल्म ‘हेरा फेरी’, जिसमें ‘बाबू भैया’ के किरदार ने उन्हें दर्शकों के दिलों में अमर कर दिया। इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता का पुरस्कार मिला। बाद में 2003 में ‘आवारा पागल दीवाना’ के लिए भी उन्हें यह सम्मान फिर एक बार हासिल हुआ। उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने 2014 में उन्हें पद्मश्री जैसे सम्मान से अलंकृत किया।




