धमतरी, 24 फरवरी ( हि. स.)। गर्मी की दस्तक होते ही मिट्टी के मटकों की पूछ परख बढ़ जाती है। इस साल भी कुम्हारपारा के कुम्हार बड़े पैमाने पर मिट्टी के बर्तन व घड़े बनाने में व्यस्त हैं। शहर व ग्रामीण अंचल में मटकों की हर साल खपत को देखते हुए कुम्हार परिवार के लोग कई महीनों से इसकी तैयारी में जुट जाते हैं। इस साल भी शहर के कुम्हारपारा के 90 परिवारों ने महीनों पहले मटकों और सुराही का निर्माण महीनों पहले शुरू कर दिया है। कुम्हारपारा के सूरज कुंभकार ने बताया कि पिछले साल लाकडाउन ने घर की आर्थिक स्थिति को काफी प्रभावित किया। समय और बनाए हुए मटकों को हम चाहकर भी नहीं बेंच पाए। इन साल यदि मौसम ठीक रहा तो थोड़ी राहत मिलेगी। गर्मी के तीन चार महीने में थोड़ी-बहुत आमदनी हो जाती है। गर्मी को देखते हुए बड़े पैमाने में मटके तैयार किए जा रहे हैं। कुम्हार पारा के जीवन कुम्हार ने बताया कि गर्मी के सीजन में मटको की मांग बढ़ जाती है। मांग को देखते हुए बड़े पैमाने पर मटको तैयार किए जा रहे हैं। मटके का पानी पीने के शौकीन लोग ही मटके की खरीदी करते हैं, बाकी सब तो वाटर कूलर से पानी पीने लगे हैं। मालूम हो कि शहर के कुम्हारपारा के अलावा आसपास के गांव से भी बड़ी तादाद में कुम्हार परिवार के लोग मटके और मिट्टी के बर्तन बेचने शहर पहुंचते हैं। वर्तमान में इसकी कीमत 50 रुपये से 70 रुपये के बीच बताई जा रही है। कुम्हारिनों का कहना है कि प्रतिस्पर्धा के दौर में मटके और मिट्टी के बर्तन बेचना मुश्किल हो चला है। सूरज कुंभकार व बिमला बाई कुंभकार ने बताया कि शहर के कुछेक लोग तो साल भर मटके का ही पानी पीते हैं, क्योंकि इनका मानना है कि स्वास्थ्य के लिहाज से मटके का पानी शरीर के लिए अनुकूल रहता है। कुम्हारों का कहना है कि गर्मी की तैयारी दो महीने पहले ही शुरू हो जाती है। शंकर लाल कुंभकार, राधेश्याम कुंभकार, फगेश्वरी बाई कुंभकार ने बताया कि मटका व अन्य सामान तैयार करने की लागत हर साल बढ़ती ही जा रही है। मिट्टी, भूसा व लकड़ी के दाम में काफी बढ़ोतरी हुई है। इसका सीधा असर मिट्टी से तैयार सामानों की कीमतों पर पड़ता है। प्रतिस्पर्धा के कारण चाहते हुए भी हम लोग मटके व अन्य सामानों की कीमत आशा के अनुरूप नहीं बढ़ा पाते। सरकार को इस दिशा में विशेष प्रयास करना चाहिए, ताकि कुम्हारों के जीवन स्तर में सुधार हो सके। हिन्दुस्थान समाचार / रोशन




