नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। इस बात में कोई दोराहे नहीं हैं कि इस समय देश में एलपीजी को लेकर आपा धापी का माहौल है। कई जगहों पर एलपीजी की किल्लत सामने आने लगी है और इसका एकमात्र कारण है ईरान और ईजरायल के बीच चल रहा युद्ध। हालांकि इसी के समकक्ष एक सवाल यह भी उठता है कि जब भारत में मुंबई, गुजरात और असम जैसी जगहों पर तेल के कुएं हैं तो क्या कारण है कि हमें अपने इस्तेमाल का 85 प्रतिशत क्रूड ऑयल विदेशों से आयात करना पड़ता है। आइए जानते हैं क्या है इसका कारण।
केवल 15 प्रतिशत का उत्पादन करता है भारत
भारत में कच्चे तेल के उत्पादन का इतिहास काफी पुराना है। हमें रिफाइनियों को चलाने और गाड़ियों के लिए जो पेट्रोल डीजल की जरूरत होती है उसके लिए दूसरे देशों से तेल लेना जरूरी हो जाता है। दरअसल, भारत तेल की मांग का केवल 10-15 प्रतिशत ही पूरा कर पाता है। इसके अलावा 85 प्रतिशत के लिए तेल उत्पादक देशों अरब या रूस पर निर्भर रहना पड़ता है।
विदेशी तेल मंगाना केवल मजबूरी नहीं, कई बार यह बड़ा आर्थिक फायदा भी होता है। हाल के दिनों में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने रूस से भारी डिस्काउंट पर तेल खरीदा है। जब विदेशी बाजार में कच्चा तेल हमें अपनी उत्पादन लागत से कम या प्रतिस्पर्धी कीमत पर मिलता है, तो वह देश की अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार के लिए बेहतर साबित होता है।
भविष्य की तैयारियों को लेकर सजग है भारत
इमरजेंसी के समय को ध्यान में रखते हुए भारतीय सरकार ‘स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व’ यानी आपातकालीन तेल भंडार बना रही है। इसके तहत विशाखापत्तनम और मंगलुरू में भारी मात्रा में तेल को स्टोर किया गया है जो युद्ध या सप्लाई रुकने की स्थिति में काम आता है।




