नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । शेयर बाजार नियामक सेबी ने इंट्राडे डेरिवेटिव ट्रेडिंग (F&O) को लेकर एक नया नियम जारी किया है, जो 1 अक्टूबर 2025 से लागू किया जाएगा। इसके तहत सेबी ने इंडेक्स ऑप्शंस में इंट्राडे नेट पोजीशन लिमिट को 1500 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 5000 करोड़ रुपये प्रति इकाई कर दिया है। सेबी का कहना है कि यह बदलाव बाजार में गहराई और स्थिरता के बीच संतुलन स्थापित करेगा। यानी जहां एक ओर ज्यादा पूंजी वाले ट्रेडर्स को बड़ी ट्रेडिंग सीमा का फायदा मिलेगा, वहीं दूसरी ओर बाजार की लिक्विडिटी और संतुलन को बनाए रखने में मदद मिलेगी।
अब 5000 करोड़ रुपये होगी इंट्राडे नेट पोजीशन लिमिट
1 सितंबर को जारी अपने सर्कुलर में सेबी ने साफ किया है कि इंडेक्स ऑप्शंस, जो डेरिवेटिव मार्केट का सबसे सक्रिय सेगमेंट है, उसमें अब इंट्राडे निवेश के लिए स्पष्ट सीमाएं लागू होंगी। नए नियम के तहत, इंट्राडे नेट पोजीशन की सीमा को फ्यूचर्स-इक्विवेलेंट (FutEq) फ्रेमवर्क के आधार पर तय किया जाएगा। लॉन्ग और शॉर्ट ट्रेड्स को समायोजित करने के बाद किसी भी ट्रेडर की अधिकतम नेट पोजीशन 5000 करोड़ रुपये से अधिक नहीं हो सकेगी। हालांकि, ग्रॉस पोजीशन लिमिट को अभी भी 10,000 करोड़ रुपये पर बरकरार रखा गया है, जो लॉन्ग और शॉर्ट दोनों साइड्स पर अलग-अलग लागू होगी। सेबी ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस नए ढांचे के चलते एक्सचेंजों पर निगरानी मानकों को सख्त किया जाएगा, ताकि बड़े पैमाने पर सट्टेबाजी को रोका जा सके और बाजार की स्थिरता बनी रहे।
सेबी के नए नियम से क्या होगा फायदा?
सेबी का कहना है कि कुछ निवेशक बाजार में जरूरत से ज्यादा लीवरेज लेकर बड़ी-बड़ी पोजीशन बना लेते हैं, जिससे जोखिम और अस्थिरता दोनों बढ़ते हैं। नए नियम के लागू होने के बाद अब ट्रेडर्स को अपनी पोजीशन केवल उपलब्ध पूंजी और मार्जिन के आधार पर ही बनानी होगी। इससे बाजार में न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि स्थिरता भी कायम रहेगी। खासतौर पर रिटेल निवेशकों को इससे बड़ा फायदा मिलेगा, क्योंकि उन्हें अब उन स्थितियों का सामना नहीं करना पड़ेगा जहां भारी उतार-चढ़ाव के कारण बड़े नुकसान की आशंका होती है। अब, जब इंट्राडे ट्रेडिंग की सीमा तय कर दी गई है, तो निवेशकों को उसी दायरे में रहकर ट्रेड करना होगा। इससे अत्यधिक लीवरेज के दुरुपयोग पर रोक लगेगी और छोटे निवेशकों के लिए जोखिम पहले की तुलना में काफी हद तक कम हो जाएगा।





