नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। ईरान युद्ध और वैश्विक तनाव के कारण देश के कई हिस्सों में गैस और तेल की किल्लत देखने को मिल रही है। कई शहरों में एलपीजी सिलेंडर के लिए लंबी कतारें लग रही हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के नेकपुर गांव में रहने वाली गौरी देवी के लिए यह परेशानी ज्यादा मायने नहीं रखती। वह अपने घर में गाय के गोबर से बनी बायोगैस से खाना पका रही हैं।
गोबर गैस से चल रहा पूरा घर
दिल्ली से करीब 90 किलोमीटर दूर नेकपुर गांव में रहने वाली 25 वर्षीय गौरी देवी ने बताया कि उनके घर में बायोगैस से चाय, दाल, सब्जी और रोटी सब कुछ आसानी से बन जाता है। उन्होंने कहा कि अगर गैस का प्रेशर कम भी हो जाए तो थोड़ी देर बाद यह फिर से सामान्य हो जाता है।
कैसे बनती है बायोगैस?
बायोगैस बनाने के लिए गाय के गोबर और पानी को मिलाकर एक बड़े भूमिगत टैंक यानी डाइजेस्टर में डाला जाता है। इस प्रक्रिया से मीथेन गैस बनती है, जो पाइप के जरिए सीधे रसोई तक पहुंचती है। इसी गैस से चूल्हा जलता है और खाना पकाया जाता है।
सरकार कई सालों से दे रही बढ़ावा
भारत सरकार और राज्य सरकारें 1980 के दशक से ग्रामीण इलाकों में बायोगैस को बढ़ावा दे रही हैं। सरकार अब तक लाखों डाइजेस्टर यूनिट्स पर सब्सिडी दे चुकी है। इसका मकसद गांवों में सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध कराना है।
गैस के साथ मिल रही जैविक खाद
बायोगैस बनने के बाद जो गोबर का घोल बचता है, उसे खेतों में खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। किसानों का कहना है कि यह खाद सामान्य गोबर से ज्यादा असरदार होती है और फसलों के लिए बेहतर मानी जाती है।
किसानों को मिल रहा बड़ा फायदा
किसान प्रमोद सिंह ने बताया कि उन्होंने 2025 में अपने घर पर बड़ी बायोगैस यूनिट लगाई थी। यह यूनिट चार गायों के गोबर से रोजाना चलती है और छह लोगों के परिवार के लिए पर्याप्त गैस देती है। उन्होंने कहा कि इससे गैस के साथ-साथ खेतों के लिए अच्छी खाद भी मिल रही है।
LPG पर कम होगी निर्भरता
भारत हर साल बड़ी मात्रा में एलपीजी विदेशों से खरीदता है। ऐसे में बायोगैस जैसे विकल्प देश की ऊर्जा जरूरतों को कम करने में मदद कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर गांवों में बायोगैस को बड़े स्तर पर बढ़ावा मिला तो भविष्य में गैस संकट का असर काफी कम हो सकता है।
पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद
बायोगैस न सिर्फ सस्ती है बल्कि पर्यावरण के लिए भी बेहतर मानी जाती है। इससे प्रदूषण कम होता है और गोबर व खेती के कचरे का सही इस्तेमाल हो पाता है। यही वजह है कि अब गांवों में लोग तेजी से इस तकनीक को अपना रहे हैं।





