नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। हिन्दू पंचांग में विवाह पंचमी एक अत्यंत पवित्र और शुभ तिथि मानी जाती है। यह वहीं दिन है जब भगवान श्रीराम और माता जानकी सीता का दिव्य विवाह संपन्न हुआ था। हर वर्ष मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को यह पर्व पूरे भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है। श्रद्धालु इस दिन व्रत रखते हैं, पूजा अर्चना करते हैं और राम–सीता के आदर्श दांपत्य का स्मरण कर आशीर्वाद की कामना करते हैं।
विवाह पंचमी क्यों मनाई जाती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी तिथि पर मिथिला नगरी में राजा जनक की पुत्री माता सीता का विवाह अयोध्या के राजकुमार श्रीराम के साथ वैदिक रीति से संपन्न हुआ था। यह विवाह केवल पौराणिक घटना नहीं बल्कि आदर्श दांपत्य, मर्यादा, निष्ठा और धर्म का प्रतीक माना जाता है।
मान्यता है कि इसी दिन गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना पूर्ण की थी। इसलिए यह तिथि आध्यात्मिक रूप से और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
विवाह पंचमी के दिन व्रत रखने का महत्व।
इस दिन व्रत रखने से दांपत्य जीवन में प्रेम, स्थिरता और सौहार्द बढ़ता है।
कुंवारे युवक–युवतियों के लिए यह व्रत विशेष फलदायी माना गया है।
घर में सुख, शांति, समृद्धि और सौभाग्य बढ़ने की मान्यता है।
विवाह पंचमी के दिन शादी क्यों नहीं होती।
हालांकि यह दिन विवाह का प्रतीक है, पर पारंपरिक रूप से इस तिथि पर विवाह समारोह नहीं कराए जाते।
इसके पीछे मान्यता है कि यह तिथि विवाह उत्सव के स्मरण और पूजा का दिन है, न कि नए विवाह करने का।
इसलिए हिन्दू समाज में इस दिन विवाह कराने की प्रथा नहीं है।
विवाह पंचमी पूजा विधि।
सुबह उठकर स्नान करें और मन को शांत करें।
पीले वस्त्र से ढकी चौकी पर राम–सीता की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
गंगाजल, फल, फूल, प्रसाद, धूप और दीप अर्पित करें।
रामचरितमानस के बालकांड में वर्णित विवाह प्रसंग का पाठ करें।
दांपत्य जीवन में प्रेम, स्थिरता और सद्भाव की कामना करते हुए संकल्प लें।
विवाह पंचमी का संदेश।
प्रेम और समर्पण का प्रतीक।
परिवार में स्थिरता बढ़ाने वाली तिथि।
भक्ति और आध्यात्मिक अनुशासन को जागृत करने का अवसर।





