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Saturday, March 7, 2026
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100 वर्षों बाद खास योग में होगी विश्वकर्मा पूजा, जानिए कब और कैसे करें आराधना

इस साल आज 17 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 08:15 से दोपहर 12:50 बजे तक रहेगा, जो 100 साल बाद अमृत सिद्धि योग, गुरु पुष्य योग और एकादशी के विशेष संगम में पड़ रहा है।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। इस बार 100 वर्षों बाद खास योग में विश्वकर्मा पूजा का पर्व आज ही के दिन 17 सितंबर को मनाया जाएगा, लेकिन इस बार का दिन साधारण नहीं है। 100 साल बाद पहली बार ऐसा अनूठा योग बन रहा है, जिसमें अमृत सिद्धि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग, गुरु पुष्य योग, शिवयोग और एकादशी का संगम एक ही दिन पड़ रहा है। जानिए, इस खास दिन का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि, जिससे आपका व्यवसाय चमकेगा और तरक्की के रास्ते खुलेंगे।

शुभ मुहूर्तः सुबह 8:15 से दोपहर 12:50 तक

पंचांग के अनुसार, आज 17 सितंबर को सुबह 8 बजकर 12 मिनट पर सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करेगा। इसके बाद से विश्वकर्मा पूजा का शुभ मुहूर्त शुरू होगा, जो दोपहर 12 बजकर 50 मिनट तक रहेगा। यह वक्त खास इसलिए भी है क्योंकि यह समय विशेष योगों के साथ मेल खाता है, जो पूजा की महत्ता को बढ़ा देते हैं।

100 वर्षों बाद बना ऐसा दुर्लभ योग

सामान्य दिनों की तुलना में इस बार विश्वकर्मा पूजा पर पाँच महान योगों का संगम हो रहा है। अमृत सिद्धि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग, गुरु पुष्य योग, शिवयोग और एकादशी का मेल मिलाप आपकी पूजा और आराधना के प्रभाव को कई गुना बढ़ाएगा। ऐसे शुभ योग दुर्लभ ही बनते हैं और इन्हें विशेष शुभ माना जाता है।

विश्वकर्मा पूजा का पौराणिक महत्व

भगवान विश्वकर्मा को हिंदू धर्म में ‘देव शिल्पी’ और ‘सृष्टि के प्रथम वास्तुकार’ के रूप में जाना जाता है। उन्होंने स्वर्गलोक के इंद्रप्रासाद, भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र, भगवान शिव का त्रिशूल, रावण की स्वर्ण लंका, पांडवों का इंद्रप्रस्थ और भगवान श्रीकृष्ण की द्वारका नगरी जैसे भव्य निर्माण किए थे। इसलिए इस दिन औजारों, मशीनों, लोहे और वाहनों की पूजा का विशेष महत्व है।

पूजा विधि – ऐसे करें विधिपूर्वक आराधना

अपने कार्यस्थल, औजार, मशीनें और वाहन को स्वच्छ करें।

पूजा स्थल पर भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।

दीपक जलाएं, पंचामृत से अभिषेक करें और पुष्प चढ़ाएं।

मंत्र जाप और हवन के माध्यम से अपने कार्यों में सफलता और समृद्धि की कामना करें।

विशेष योग के प्रभाव को ध्यान में रखकर इस बार पूजा विधि को और भी मनोयोग से करें।

क्यों है यह पर्व खास?

विश्वकर्मा पूजा ‘श्रमिकों का पर्व’ भी कहा जाता है। यह दिन मेहनतकश कारीगरों, इंजीनियरों, तकनीकी कर्मियों और उद्योगपतियों के लिए सफलता और समृद्धि का प्रतीक है। इस दिन अपने औजारों और मशीनों की पूजा करने से न केवल व्यवसाय में तरक्की होती है, बल्कि यह मेहनत और कौशल का सम्मान भी है।

इस बार विश्वकर्मा पूजा का पर्व 17 सितंबर को मनाया जाएगा, लेकिन इस बार का दिन साधारण नहीं है। 100 साल बाद पहली बार ऐसा अनूठा योग बन रहा है, जिसमें अमृत सिद्धि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग, गुरु पुष्य योग, शिवयोग और एकादशी का संगम एक ही दिन पड़ रहा है। जानिए, इस खास दिन का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि, जिससे आपका व्यवसाय चमकेगा और तरक्की के रास्ते खुलेंगे।

विश्वकर्मा पूजा के लिए मंत्र और पूजा विधि

1. विश्वकर्मा देव मंत्र

पूजा के दौरान इस मंत्र का जाप करें ताकि भगवान विश्वकर्मा की कृपा बनी रहे। 

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥

ॐ विश्वकर्मणे नमः ॥

इस मंत्र का 108 बार जाप करने से कार्यों में सफलता और समृद्धि आती है।

2. पूजा की विधि

भगवान विश्वकर्मा की तस्वीर या प्रतिमा

दीपक (घी का दीपक बेहतर होता है)

लाल और पीले पुष्प

अक्षत (चावल)

पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, और चीनी)

धूप, अगरबत्ती

मिठाई और फल

तुलसी के पत्ते

पूजा चरण

स्थान सजाएं: पूजा स्थल को साफ करें, साफ कपड़ा बिछाएं और भगवान विश्वकर्मा की तस्वीर/मूर्ति स्थापित करें।

प्रसाद लगाएं: पंचामृत से भगवान की प्रतिमा का अभिषेक करें।

दीपक और धूप करें: दीपक जलाएं और धूप से वातावरण को शुद्ध करें।

मंत्र जाप करें: ऊपर दिया गया मंत्र जाप करें।

पूजा अर्पित करें: पुष्प, अक्षत और फल चढ़ाएं।

हवन करें (यदि संभव हो): हल्का हवन करके आराधना को पूर्ण करें।

प्रसाद वितरण: पूजा के बाद प्रसाद वितरित करें और सभी के लिए खुशहाली की प्रार्थना करें।

पूजा के दौरान मन में भगवान विश्वकर्मा की कृपा से अपने कार्य, मशीनें, औजार, और व्यवसाय सफल होने की दृढ़ इच्छा रखें।

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