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Tuesday, March 10, 2026
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Janmashtami 2025: मटकी फोड़ो और कर लो धमाल, कन्हैया की शरारत से रंग जाएगा हर साल

श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की धूम में ‘मटकी फोड़’ बनेगा आकर्षण का केंद्र, जानिए कैसे सजती है ये परंपरा बच्चों और बड़ों के लिए त्यौहार को सुपर धमाकेदार गोविंदा आला रे।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। हर गली में गूंज रही है बांसुरी की तान, हर चौक पर सजी हैं श्रीकृष्ण की झांकियां, और आसमान को छूती मटकी की ऊंचाई को फोड़ने को तैयार है गोविंदाओं की टोली। जी हां, जन्माष्टमी आने वाली है और इसके साथ ही शुरू हो गई है तैयारियां ‘दही-हांडी’ की, यानी मटकी फोड़ने की। 

श्रीकृष्ण के जन्म की यह रात जितनी पवित्र है, उतनी ही जोशीली भी। आधी रात को जैसे ही घड़ी की सुइयां 12 बजाती हैं, मंदिरों में शंख-घंटियों की गूंज के साथ होती है कृष्ण जन्म की घोषणा।

 आधी रात का चमत्कार: जब जेल में जन्मे थे श्रीकृष्ण

मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा की जेल में हुआ था, आधी रात को। तभी तो इस दिन रात्रि जागरण, भजन-कीर्तन, और विशेष झांकियां हर शहर, हर गांव में देखने को मिलती हैं।भक्त दिनभर व्रत रखते हैं, और रात 12 बजे जैसे ही ‘नंद के घर आनंद भयो’ गूंजता है, पूरा माहौल कृष्णमय हो जाता है।

मक्खन चोर की मस्ती: मटकी फोड़ की परंपरा का मजा ही कुछ और है!

कृष्णजी बचपन में बड़े नटखट थे। दोस्तों संग मिलकर माखन की मटकी चुराने निकल पड़ते थे। आज इसी शरारत को त्यौहार में बदला गया है – दही-हांडी के रूप में। ऐसे ही राजस्थान के गोविंदाजी के प्रमुख आयोजक अर्जुन सिंह ने बताया,यह परंपरा हमें श्रीकृष्ण की शरारतों और उनके साथ जुड़ी सामाजिक एकता की भावना याद दिलाती है। मटकी फोड़ने में जोश के साथ-साथ संयम और टीम वर्क का भी समावेश होता है।

वहीं आंकड़ों की बात करें तो,देशभर में जन्माष्टमी के मौके पर करीब 500 से अधिक दही-हांडी प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं, जिनमें हजारों युवा हिस्सा लेते हैं। इनमें से लगभग 70 प्रतिशत आयोजन महाराष्ट्र में होते हैं, जहां यह परंपरा सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। यह आयोजन न केवल एक खेल है बल्कि इसमें टीम वर्क, धैर्य और उत्साह की भी झलक मिलती है। मटकी के भीतर भरा दही और मक्खन फोड़ने वाला गोविंदा जीतता है, लेकिन इस परंपरा का असली सार है श्रीकृष्ण के प्रति गहरा प्रेम और भक्ति।

मथुरा के मंदिर समिति के अध्यक्ष बालकृष्ण गुप्ता कहते हैं

जन्माष्टमी का पर्व सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का उत्सव भी है। इस दिन हर वर्ग के लोग मिलकर भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं का उत्सव मनाते हैं। जन्माष्टमी के अवसर पर यह परंपरा सामाजिक सौहार्द और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक बनी हुई है। इस बार भी लाखों श्रद्धालु इस पर्व को बड़ी धूमधाम से मनाने को तैयार हैं, जहां बच्चे-बूढ़े मिलकर भगवान कृष्ण की बाल लीला का आनंद लेंगे।

महाराष्ट्र हो या मथुरा, गुजरात हो या दिल्ली – हर जगह गोविंदाओं की टोली मटकी फोड़ने को तैयार रहती है। रंग-बिरंगी पोशाक, ढोल-नगाड़े, और “गोविंदा आला रे!” के नारे से माहौल एकदम फिल्मी हो जाता है।

 आस्था भी, उत्सव भी

जन्माष्टमी केवल धार्मिक आयोजन नहीं, यह बच्चों के लिए सीख है, बड़ों के लिए श्रद्धा, और युवाओं के लिए उत्साह का पर्व।कृष्ण के जीवन से हमें मिलती है साहस, प्रेम और नीति की प्रेरणा।

तो इस बार तैयार हो जाइए…

कन्हैया के स्वागत में झूमेंगे मंदिर, झिलमिलाएंगी झांकियां, और मटकी फोड़ की गूंज से गूंजेगी गली-गली।जय कन्हैया लाल की!”

टीम वर्क का खेल: ताकत, संतुलन और जोश का संगम

गोविंदाओं की टोली बनती है।

ऊँचाई पर टंगी मटकी को पाने के लिए बनती है इंसानी पिरामिड।

सबसे ऊपर चढ़ता है ‘मुख्य गोविंदा’, जो मटकी फोड़ता है।

मटकी में भरा होता है दही, मक्खन और कई बार इनाम भी।

यह खेल न केवल मनोरंजन है, बल्कि टीमवर्क, धैर्य और संतुलन का बेहतरीन उदाहरण भी है।

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