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Sunday, March 29, 2026
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कितने प्रकार के होते हैं पितर और कितने तरह के श्राद्ध ? जानें, किस पितर के लिए कर रहे हैं आप तर्पण?

पुराणों के अनुसार, पितरों को मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित किया गया है और इनसे जुड़े अलग-अलग श्राद्ध विधानों का भी शास्त्रों में विस्तार से वर्णन किया गया है।

नई दिल्‍ली / रफ्तार डेस्‍क । श्राद्ध पक्ष चल रहा है और इस दौरान लाखों लोग अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण और पिंडदान कर रहे हैं। सनातन धर्म में श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से किया गया कर्म और यही भाव इस परंपरा की आत्मा है। पुराणों के अनुसार, पितरों के भी कई प्रकार होते हैं और उनके लिए किए जाने वाले श्राद्ध कर्मों के भी। मान्यता है कि तीन प्रकार के पितर होते हैं और उनके लिए 12 अलग-अलग प्रकार के श्राद्ध बताए गए हैं। प्रत्येक श्राद्ध का उद्देश्य अलग होता है और यह तय करता है कि किस प्रकार का तर्पण किस पितर के लिए किया जाना चाहिए। यह परंपरा न सिर्फ धार्मिक आस्था से जुड़ी है, बल्कि हमारे संस्कारों और पारिवारिक मूल्यों का भी प्रतीक है।

पितरों के प्रकार और श्राद्ध की विधियां

पुराणों के अनुसार पितरों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा गया है- नित्य पितर, नैमित्तिक पितर और साप्तमिक पितर। नित्य पितर वे हैं जो सदा उपस्थित रहते हैं और जिनका तर्पण नियमित रूप से किया जाता है। विष्णु पुराण में इन्हें उन पूर्वजों के रूप में वर्णित किया गया है जो आत्मा की शांति के लिए निरंतर तर्पण की अपेक्षा रखते हैं। इन्हें देवताओं का स्थान प्राप्त है और माना जाता है कि ये ही प्रकृति के हर जड़-चेतन और जीवधारी के शरीर का निर्माण करते हैं। ब्रह्म पुराण में भी नित्य पितरों का उल्लेख मिलता है और इनकी पूजा को वंश की रक्षा से जोड़ा गया है।

नैमित्तिक पितर वे माने जाते हैं जिन्हें विशेष अवसरों पर याद किया जाता है, जैसे किसी की मृत्यु की तिथि या कोई खास पारिवारिक घटना। स्कंद पुराण में इन्हें हविर्भुज कहा गया है। अर्थात अग्नि में अर्पित हवि को ग्रहण करने वाले पितर। मनु स्मृति में इन्हें आज्यपा भी कहा गया है और इनका वर्गीकरण चार वर्णों के आधार पर किया गया है: सोमपा, हविर्भुज, आज्यपा और सुकालिन। 

साप्तमिक पितर वे हैं जिनका तर्पण सप्ताह के विशेष दिनों में किया जाता है। भविष्य पुराण और मत्स्य पुराण के अनुसार ये वे पितर हैं जो मृत्यु के बाद सपिंडन संस्कार के पश्चात पितृ योनी में प्रवेश करते हैं। इन्हें शिव गणों के समान मान्यता प्राप्त है।

इसके अलावा, पितरों को वसु पितर, रुद्र पितर और आदित्य पितर के तीन अन्य रूपों में भी वर्गीकृत किया गया है। वसु पितर वे होते हैं जो हाल ही में शरीर का त्याग कर चुके होते हैं, जैसे माता-पिता। रुद्र पितर दादा-दादी जैसे पूर्वज होते हैं, जबकि आदित्य पितर वे सबसे पुराने पूर्वज होते हैं, जैसे परदादा-परदादी। पुराणों के अनुसार, मृत्यु के बाद आत्मा पहले प्रेत योनी में जाती है और फिर पितृ योनी में प्रवेश करती है। तर्पण इन्हीं विभिन्न प्रकारों के पितरों के लिए किया जाता है।

इसी तरह श्राद्ध के भी कई प्रकार होते हैं। हालाँकि मत्स्य पुराण में केवल तीन प्रकार, स्मृतिग्रंथों में पाँच प्रकार और भविष्य पुराण में 96 अवसर बताए गए हैं जब श्राद्ध किया जा सकता है—जिनमें अमावस्या और पूर्णिमा जैसे दिन भी शामिल हैं। लेकिन सामान्य रूप से 12 प्रकार के श्राद्ध अधिक प्रचलित माने जाते हैं।

इनमें नित्य श्राद्ध प्रतिदिन किया जाने वाला श्राद्ध होता है, जिसमें तिल, जल, दूध आदि से पितरों को तृप्त किया जाता है। नैमित्तिक श्राद्ध विशेष अवसरों जैसे मृत्यु तिथि पर किया जाता है। काम्य श्राद्ध विशेष इच्छाओं की पूर्ति के लिए होता है, जैसे संतान प्राप्ति। वृद्धि श्राद्ध परिवार में विवाह या नए सदस्य के आगमन पर किया जाता है। सपिण्डन श्राद्ध मृत्यु के बाद सपिण्डन संस्कार के दौरान होता है।

इसके अलावा पार्वण श्राद्ध पितृ पक्ष में किया जाने वाला मुख्य श्राद्ध होता है। गोष्ठी श्राद्ध समूह में किया जाता है। प्रेत श्राद्ध उन आत्माओं के लिए होता है जो प्रेत योनी में फंसी होती हैं। कर्मांग श्राद्ध जीवन के विशेष कर्मों से जुड़ा होता है। वहीं दैविक श्राद्ध देवताओं को समर्पित होता है। यात्रार्थ श्राद्ध यात्रा के समय किया जाता है और पुष्ट्यर्थ श्राद्ध पोषण और बल के लिए किया जाता है। इन तमाम वर्णनों से यह स्पष्ट होता है कि श्राद्ध केवल एक धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि एक गहरी पौराणिक और आध्यात्मिक परंपरा का हिस्सा है, जिसमें श्रद्धा, ज्ञान और सही विधि का विशेष महत्व है।

श्राद्ध के 30 नियम

वायु पुराण में श्राद्ध से जुड़े 30 नियमों का उल्लेख मिलता है, जो इसके सही विधि-विधान पर विशेष बल देते हैं। ये नियम न केवल कर्मकांड की पवित्रता सुनिश्चित करते हैं, बल्कि यह भी बताते हैं कि श्राद्ध किस भावना और प्रक्रिया के साथ किया जाना चाहिए। पुराणों के अनुसार, श्राद्ध पांच महायज्ञों में से एक है, जिनमें ब्रह्म यज्ञ, देव यज्ञ और पितृ यज्ञ प्रमुख हैं। ये यज्ञ वेदों और पुराणों में विशेष रूप से वर्णित हैं और इन्हें व्यक्ति के धार्मिक कर्तव्यों में गिना गया है। पितरों और श्राद्ध का वर्णन केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि यह हमें हमारे पूर्वजों के प्रति जिम्मेदारियों और आभार की भी याद दिलाता है। यही कारण है कि सनातन परंपरा केवल वर्तमान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों की उपस्थिति मानी जाती है।

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