नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। गणेश चतुर्थी के अवसर पर भगवान गणेश को मोदक और लड्डू के साथ-साथ दूर्वा घास चढ़ाना एक प्राचीन परंपरा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन समय में अनलासुर नामक राक्षस ने धरती और स्वर्ग में आतंक मचा रखा था। देवताओं और ऋषियों ने भगवान गणेश से सहायता मांगी। गणेश जी ने राक्षस को निगल लिया, लेकिन इससे उनके पेट में जलन होने लगी। कश्यप ऋषि ने उन्हें 21 गांठें दूर्वा खाने की सलाह दी। दूर्वा खाने के बाद उनकी जलन शांत हुई और तब से गणेश जी को दूर्वा अत्यंत प्रिय हो गई। यही कारण है कि हर गणेश चतुर्थी पर दूर्वा घास चढ़ाने की परंपरा निभाई जाती है।
दूर्वा के स्वास्थ्य लाभ
सिर्फ धार्मिक महत्व ही नहीं, दूर्वा में औषधीय गुण भी हैं जो सेहत के लिए बेहद फायदेमंद हैं। आयुर्वेद में इसे अमृत समान माना गया है। पहला फायदा यह है कि दूर्वा पाचन तंत्र को सुधारती है। इसका रस पेट की जलन, एसिडिटी और कब्ज जैसी समस्याओं को दूर करता है। दूसरा, इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं और इम्युनिटी मजबूत करते हैं। तीसरा, दूर्वा का लेप त्वचा के लिए लाभकारी है; यह खुजली, रैशेज और अन्य त्वचा समस्याओं को कम करता है और त्वचा को ठंडक व पोषण देता है। चौथा, ब्लड शुगर नियंत्रण में मदद करता है, जिससे डायबिटीज के मरीज इसका घरेलू उपाय मान सकते हैं। पांचवा, दूर्वा शरीर को ठंडक पहुंचाती है, जिससे गर्मियों में नकसीर और पेट की जलन जैसी समस्याओं में राहत मिलती है।
पूजा और स्वास्थ्य का संगम
इस गणेश चतुर्थी, जब आप बप्पा को दूर्वा चढ़ाएं, तो सिर्फ धार्मिक दृष्टि ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य लाभ को भी याद रखें। दूर्वा न केवल पूजा सामग्री है, बल्कि यह प्राकृतिक औषधि और शरीर व मन दोनों के लिए लाभकारी घास भी है। इस प्रकार, गणपति पूजा में दूर्वा का महत्व धार्मिक परंपरा और वैज्ञानिक दृष्टि दोनों से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस तरह, गणेश जी की प्रिय दूर्वा न केवल उनकी कृपा पाने का साधन है, बल्कि स्वास्थ्य और भलाई का भी एक अनमोल उपहार है।





