नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क । बिहार की राजनीति में लालू यादव और नीतीश कुमार के रिश्ते की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं। दोनों नेता पहली बार 1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण के सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन के दौरान मिले और तब से उनके राजनीतिक सफर की नींव रखी गई। समय ने इन दोनों के रिश्तों में उतार-चढ़ाव भी देखे।
लालू-नीतीश के रिश्ते में उतार-चढ़ाव ज्वार-भाटे की तरह आते रहे हैं। महागठबंधन से अलग होने के बाद नीतीश की राजनीतिक वापसी मजबूत हुई है, जबकि पुत्र मोह में फंसकर लालू एक बार फिर हाशिये पर चले गए हैं, जिससे बिहार की राजनीति में नई गहमागहमी पैदा हो गई है।
बिहार विधानसभा चुनाव 2015 में महागठबंधन बनाकर पीएम मोदी की लहर रोकने के बाद लालू-नीतीश की जोड़ी अटूट दिखी, लेकिन महागठबंधन दो साल भी नहीं टिक सका। 1970 से शुरू हुई उनकी दोस्ती अब राजनीतिक उतार-चढ़ाव और टकराव की कहानी बन चुकी है, जो बिहार की राजनीति को लगातार रोचक बनाती है।
जब लालू प्रसाद यादव पहली बार बने सीएम
1990 के बिहार विधानसभा चुनाव में जनता दल को बहुमत मिला। मुख्यमंत्री पद की दौड़ में नीतीश कुमार ने लालू यादव का पूरा समर्थन किया और लालू पहली बार मुख्यमंत्री बने। इस दौरान नीतीश, लालू के विश्वासपात्र और अहम सलाहकार के रूप में सामने आए, जिससे उनकी राजनीतिक जोड़ी और मजबूत हुई।
दो साल बाद बदल गए राजनीतिक हालात
1994 में, सिर्फ दो साल बाद, नीतीश और लालू के बीच मनमुटाव पैदा हो गया। कथित तौर पर नौकरियों में जातिगत प्राथमिकता और ट्रांसफर-पोस्टिंग में भ्रष्टाचार को लेकर नीतीश नाराज थे। इसके बाद नीतीश, लालू के खिलाफ बगावत करने वाले खेमे में शामिल हो गए और राजनीतिक हालात बदल गए।
1994 में नीतीश कुमार ने जॉर्ज फर्नांडीस के साथ मिलकर समता पार्टी बनाई और लालू से अलग हो गए। लेकिन यह कदम सफल नहीं रहा। विधानसभा चुनाव में नीतीश केवल सात सीटें जीत सके, जबकि लालू दूसरी बार विधानसभा चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बने और राजनीतिक रूप से मजबूती हासिल की।
जेल जाने से पहले पत्नी को बनाया सीएम
1996-97 में पटना हाईकोर्ट ने चारा घोटाले में CBI जांच का आदेश दिया, जिससे लालू को सत्ता गंवानी पड़ी और उन्हें जेल भी जाना पड़ा। माना जाता है कि जांच के लिए याचिका में नीतीश कुमार की बड़ी भूमिका थी। हालांकि, जेल जाने से पहले लालू ने पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया और अगले विधानसभा चुनाव में भी जीत हासिल की।
नीतीश कुमार पहली बार बने सीएम
2003 में नीतीश कुमार ने शरद यादव की जनता दल और अपनी समता पार्टी का विलय कर जनता दल यूनाइटेड का गठन किया और बीजेपी के साथ गठबंधन किया। 2005 के विधानसभा चुनाव में नीतीश और बीजेपी ने लालू के खिलाफ मिलकर चुनाव लड़ा और सत्ता पर कब्जा किया। इस जीत के साथ नीतीश पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने।
नरेंद्र मोदी की वजह से गठबंधन से तोड़ा नाता
जून 2013 में नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी को पीएम उम्मीदवार घोषित किए जाने पर बीजेपी से 17 साल पुराने रिश्ते को तोड़ दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में उनका गठबंधन केवल दो सीटें जीत सका, जबकि लालू यादव के खाते में चार सीटें गईं, जिससे नीतीश के राजनीतिक दबदबे पर असर पड़ा।
दोनो नेता 20 साल बाद एक हुए
जुलाई 2014 में नीतीश कुमार और लालू यादव ने 20 साल बाद गठबंधन का ऐलान किया। दोनों नेताओं ने गले मिलकर महागठबंधन की नींव रखी। कांग्रेस के साथ आने के बाद 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन ने बीजेपी नेतृत्व वाले एनडीए को करारी शिकस्त दी।
अब बीजेपी के करीब है नीतीश कुमार
सितंबर 2016 में नीतीश कुमार ने आरजेडी के विपरीत सर्जिकल स्ट्राइक का समर्थन किया। इसके बाद नवंबर 2016 में नोटबंदी का भी समर्थन किया। इसी दौरान नीतीश, लालू यादव से दूर होने लगे और धीरे-धीरे बीजेपी के करीब होते गए, जिससे बिहार की राजनीतिक तस्वीर बदलनी शुरू हुई।
बता दें कि, आज नीतीश कुमार बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री है। वह बीजेपी के साथ गठबंधन कर एनडीए का हिस्सा है। बिहार में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव है ऐसे में राज्य की सियासत में हलचल तेज हो गई है।




