नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर चुनावी प्रक्रिया पूरी तेजी से चल रही है। मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए गहन पुनरीक्षण अभियान शुरू किया गया है। लेकिन इस बार मतदाता सत्यापन के नियमों में बड़ा बदलाव किया गया है। जिन दस्तावेजों को पहले पहचान के तौर पर आसानी से स्वीकार किया जाता था, जैसे-आधार कार्ड, वोटर आईडी कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और मनरेगा कार्ड, अब इन्हें मतदाता पहचान के लिए मान्यता नहीं दी जा रही है। इस बदलाव को लेकर विपक्षी पार्टियों ने सवाल उठाए हैं और इसे जनता के लिए परेशानी का कारण बताया है। हालांकि चुनाव आयोग अपनी योजना पर कायम है।
अब इन 11 दस्तावेजों से होगी पहचान
बिहार में चल रहे गहन मतदाता पुनरीक्षण अभियान के तहत चुनाव आयोग ने मतदाता पहचान के लिए दस्तावेजों की सूची में बड़ा बदलाव किया है। इस बार आम तौर पर इस्तेमाल होने वाले आधार कार्ड, वोटर आईडी और मनरेगा कार्ड को मान्य नहीं किया गया है। इसके बजाय आयोग ने 11 वैकल्पिक दस्तावेजों को पहचान के लिए स्वीकार करने का निर्देश दिया है। बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर मतदाताओं की पुष्टि और पंजीकरण कर रहे हैं।
ये हैं मान्य दस्तावेज:
1. नियमित सरकारी कर्मचारी या पेंशनधारकों का पहचान पत्र
2. पासपोर्ट
3. बैंक, डाकघर या एलआईसी आदि द्वारा 1 जुलाई 1987 से पहले जारी किया गया कोई प्रमाण पत्र
4. सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र
5. किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड या विश्वविद्यालय द्वारा जारी शैक्षिक प्रमाण पत्र
6. स्थायी निवास प्रमाण पत्र
7. वन अधिकार प्रमाण पत्र
8. जाति प्रमाण पत्र
9. राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) में दर्ज नाम या दस्तावेज
10. सरकार द्वारा आवंटित भूमि या मकान का प्रमाण पत्र
11. राज्य सरकार या स्थानीय निकाय द्वारा तैयार पारिवारिक रजिस्टर
आधार, वोटर ID और मनरेगा कार्ड को क्यों किया गया बाहर?
चुनाव आयोग ने इस बार मतदाता सत्यापन के लिए आधार कार्ड, वोटर आईडी और मनरेगा कार्ड जैसे आमतौर पर उपयोग किए जाने वाले दस्तावेजों को अमान्य कर दिया है। इसकी प्रमुख वजह यह बताई जा रही है कि ये दस्तावेज केवल पहचान को दर्शाते हैं, लेकिन नागरिकता या स्थायी निवास का पुख्ता प्रमाण नहीं देते।
आयोग का कहना है कि इस विशेष पुनरीक्षण अभियान का मुख्य उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना है। खासकर, यह सुनिश्चित करना कि केवल भारतीय नागरिक ही मतदाता सूची में शामिल हों। इस कवायद के तहत अवैध विदेशी नागरिकों को सूची से बाहर करने की योजना है। इसलिए इस बार ऐसे दस्तावेज मांगे जा रहे हैं जो नागरिकता और स्थायी निवास का स्पष्ट प्रमाण प्रदान करते हों। यह विशेष अभियान फिलहाल छह राज्यों में शुरू किया जा रहा है, जिसकी शुरुआत बिहार से की गई है।
करीब 2 करोड़ लोग होंगे मतदाता सूची से बाहर
बिहार में चल रहे विशेष मतदाता पुनरीक्षण अभियान को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। इंडिया ब्लॉक से जुड़े कई विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग से मिलकर शिकायत की है कि इस प्रक्रिया के जरिए राज्य के करीब दो करोड़ लोगों को मतदाता सूची से बाहर किया जा सकता है। उनका तर्क है कि इन लोगों के पास अब तक मान्य रहे दस्तावेज (जैसे आधार कार्ड या वोटर आईडी) तो हैं, लेकिन आयोग द्वारा मांगे जा रहे नए दस्तावेज उनके पास नहीं हैं।
विपक्ष ने इस अभियान को चुनाव से ठीक पहले मताधिकार छीनने की साजिश करार दिया है। उनका कहना है कि यह प्रक्रिया गरीब और वंचित तबकों के खिलाफ है, जिनके पास सीमित संसाधनों और दस्तावेजों की कमी है। इस पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने कहा कि, “यह विशेष पुनरीक्षण किसी को बाहर करने के लिए नहीं, बल्कि सभी पात्र नागरिकों को सूची में सम्मिलित करने के लिए है। यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है और कोई भी योग्य मतदाता इससे वंचित नहीं रहेगा।”
22 साल बाद बिहार में हो रहा गहन मतदाता पुनरीक्षण
CEC ज्ञानेश कुमार ने जानकारी दी है कि बिहार में 22 वर्षों बाद इस तरह का व्यापक मतदाता पुनरीक्षण अभियान चलाया जा रहा है। आयोग का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक और निष्पक्ष बनाना है। इस प्रक्रिया में सभी प्रमुख राजनीतिक दलों को शामिल किया गया है ताकि पारदर्शिता बनी रहे। राज्य भर में लाखों बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) गांव-गांव जाकर मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच कर रहे हैं। चुनाव आयोग का कहना है कि यह अभियान मतदाता सूची को ‘शुद्ध’ करने और केवल वैध भारतीय नागरिकों को ही सूची में शामिल करने के मकसद से शुरू किया गया है।
बिहार के बाद यह प्रक्रिया असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में शुरू की जाएगी, जहां वर्ष 2026 में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। इस बीच, देशभर में अवैध प्रवासियों के खिलाफ चल रही कार्रवाई और नागरिकता से जुड़ी बहसों के बीच यह विशेष पुनरीक्षण अभियान एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बनता जा रहा है।





