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Tuesday, April 14, 2026
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Governor Removal Rule: देश में किसी राज्य के गवर्नर को कैसे हटाया जाता है? जानिए संविधान में क्या हैं इसके नियम

बिहार में सैयद अता हसनैन को राज्य का नया गवर्नर घोषित किया गया है। आइए जानते हैं कि किसी गवर्नर को पद से कैसे हटाया जाता है।

नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। Syed Ata Hasnain को बिहार का नया राज्यपाल नियुक्त किए जाने के बाद एक बार फिर यह सवाल उठने लगा है कि देश में किसी राज्य के गवर्नर को पद से कैसे हटाया जाता है। वह Arif Mohammad Khan की जगह यह जिम्मेदारी संभालेंगे। ऐसे में आइए आसान भाषा में समझते हैं कि संविधान के अनुसार गवर्नर की नियुक्ति, कार्यकाल और हटाने के क्या नियम हैं।

संविधान में क्या है गवर्नर को हटाने का नियम

भारतीय संविधान में गवर्नर को हटाने का प्रावधान आर्टिकल 156 में दिया गया है। इसके अनुसार राज्यपाल अपने पद पर राष्ट्रपति की मर्जी तक बने रहते हैं। इसका मतलब यह है कि भारत के राष्ट्रपति किसी भी समय गवर्नर को पद से हटा सकते हैं। इसके लिए संसद में वोटिंग या महाभियोग (इंपीचमेंट) जैसी लंबी प्रक्रिया की जरूरत नहीं होती।

हटाने के लिए तय कारण जरूरी नहीं

गवर्नर को हटाने के लिए संविधान में कोई निश्चित कारण तय नहीं किया गया है। दूसरे संवैधानिक पदों की तरह यह साबित करना जरूरी नहीं होता कि उन्होंने कोई गलती की है या कानून का उल्लंघन किया है। तकनीकी रूप से राष्ट्रपति बिना कारण बताए भी गवर्नर को पद से हटा सकते हैं।

केंद्र सरकार की क्या होती है भूमिका

हालांकि संविधान यह अधिकार राष्ट्रपति को देता है, लेकिन व्यवहार में यह फैसला केंद्र सरकार लेती है। भारत की संसदीय व्यवस्था में राष्ट्रपति आमतौर पर केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करते हैं। इसलिए किसी गवर्नर की नियुक्ति या हटाने का निर्णय आमतौर पर केंद्र सरकार की सिफारिश पर ही होता है।

गवर्नर खुद भी दे सकते हैं इस्तीफा

अगर कोई गवर्नर अपने पद से हटना चाहता है तो वह खुद भी इस्तीफा दे सकता है। इसके लिए राज्यपाल को राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेजना होता है। इस्तीफा स्वीकार होने के बाद उनका कार्यकाल खत्म हो जाता है और केंद्र सरकार नए गवर्नर की नियुक्ति करती है।

गवर्नर को हटाने के लिए महाभियोग नहीं

भारत के राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए संसद में महाभियोग की जटिल प्रक्रिया होती है। लेकिन गवर्नर के मामले में ऐसा नहीं है। उन्हें हटाना एक कार्यपालिका स्तर का फैसला होता है, जिसके लिए किसी विशेष संसदीय प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ती। इस मुद्दे पर Supreme Court ने 2010 में बी.पी. सिंघल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा था कि गवर्नर राष्ट्रपति की मर्जी से पद पर रहते हैं, लेकिन उन्हें हटाने की शक्ति का इस्तेमाल मनमाने या केवल राजनीतिक कारणों से नहीं किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि केवल केंद्र में नई सरकार आने के कारण किसी गवर्नर को हटाना उचित नहीं माना जाएगा।

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