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Friday, April 3, 2026
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चुन लिए गये अगले नए पोप, रॉबर्ट प्रीवोस्ट बने सबसे बड़े ईसाई धर्मगुरु, जानिए इनका परिचय

वरिष्ठ कार्डिनलों ने घोषणा की कि अमेरिका के रॉबर्ट प्रीवोस्ट को कैथोलिक चर्च का नया पोप चुना गया है। वे पोप लियो XIV के नाम से जाने जाएंगे ।

नई दिल्‍ली / रफ्तार डेस्‍क । वेटिकन सिटी में सिस्टिन चैपल की चिमनी से सफेद धुआं उठता दिखाई दिया, यह संकेत है कि कैथोलिक चर्च को उसका नया आध्यात्मिक लीडर मिल गया है। इस महत्वपूर्ण क्षण के बाद सीनियर कार्डिनलों ने घोषणा की कि अमेरिका के रॉबर्ट प्रीवोस्ट को कैथोलिक चर्च का नया पोप चुना गया है। वह पोप लियो XIV के नाम से जाने जाएंगे और खास बात यह है कि वह इस पद पर पहुँचने वाले पहले अमेरिकी हैं।

सिस्टिन चैपल से धुआं निकलने के लगभग 70 मिनट बाद पोप लियो XIV सेंट पीटर्स बेसिलिका की प्रसिद्ध बालकनी पर पहली बार दुनिया के सामने आए। हजारों लोगों की भीड़ सेंट पीटर्स स्क्वेयर में इस ऐतिहासिक पल की साक्षी बनी। इस बड़े ऐलान को फ्रांस के कार्डिनल डोमिनिक माम्बरटी ने सार्वजनिक किया। उन्होंने घोषणा करते हुए कहा “हैबेमस पापम” यानी हमारे पास एक पोप है कहते हुए नए पोप के नाम का खुलासा किया। 133 कार्डिनल निर्वाचकों की प्रक्रिया के बाद अब चर्च को एक नया मार्गदर्शक मिला है, जिससे दुनियाभर के कैथोलिकों की निगाहें अब पोप लियो XIV की ओर हैं।

कौन हैं रॉबर्ट प्रीवोस्ट?

नए चुने गए पोप लियो XIV, जिनका असली नाम रॉबर्ट प्रीवोस्ट है, जो 69 वर्ष के हैं और अमेरिका के शिकागो शहर से ताल्लुक रखते हैं। वे मूल रूप से अमेरिकी हैं, लेकिन उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा पेरू में एक मिशनरी के रूप में सेवा करते हुए बिताया। यही अनुभव उन्हें वैश्विक चर्च की जरूरतों और विविधता को समझने की गहराई देता है।

रॉबर्ट प्रीवोस्ट को 2023 में कार्डिनल के रूप में नियुक्त किया गया था। वे मीडिया से दूर रहना पसंद करते हैं और सार्वजनिक रूप से बहुत कम बोलते हैं, जिससे वे एक शांत, लेकिन गहरी आध्यात्मिकता वाले व्यक्ति के रूप में देखे जाते हैं। पोप फ्रांसिस के निधन के बाद प्रीवोस्ट को 267वें पोप के रूप में चुना गया। पोप फ्रांसिस, जो पहले लैटिन अमेरिकी पोप थे, ने लगभग 12 वर्षों तक चर्च का नेतृत्व किया और कई ऐतिहासिक बदलावों की शुरुआत की। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि पोप लियो XIV इस विरासत को कैसे आगे बढ़ाते हैं।

कैसे चुना जाता है नया पोप, क्‍या है प्रक्रिया ?

कैथोलिक चर्च में नया पोप चुनने की प्रक्रिया को पैपल कॉन्क्लेव कहा जाता है। एक परंपरा जो सदियों पुरानी है और पूरी तरह से गोपनीयता में निभाई जाती है। जब किसी पोप का निधन हो जाता है या वे अपने पद से इस्तीफा दे देते हैं, तब यह प्रक्रिया सक्रिय होती है। दुनियाभर से आए कैथोलिक चर्च के वरिष्ठ पादरी, जिन्हें कार्डिनल कहा जाता है, इस चुनाव में भाग लेते हैं। केवल वही कार्डिनल्स जिनकी उम्र 80 वर्ष से कम होती है, उन्हें वोट डालने का अधिकार मिलता है। आमतौर पर 120 ऐसे कार्डिनल्स इस कॉन्क्लेव में हिस्सा लेते हैं। ये सभी या तो विभिन्न देशों के बिशप होते हैं या फिर वेटिकन के वरिष्ठ अधिकारी और इनकी नियुक्ति स्वयं पोप द्वारा की जाती है।

यह ऐतिहासिक प्रक्रिया वेटिकन सिटी की सिस्टिन चैपल में आयोजित की जाती है। कॉन्क्लेव शुरू होने से पहले, सभी कार्डिनल्स गोपनीयता की शपथ लेते हैं और फिर बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट जाते हैं, न मोबाइल, न ईमेल, न कोई संपर्क। पोप के चुनाव के लिए सीक्रेट बैलेटिंग की जाती है। दिन में अधिकतम चार बार वोटिंग हो सकती है, और यह तब तक चलती है जब तक कोई एक उम्मीदवार दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर लेता। हर वोटिंग के बाद बैलेट पेपर जलाए जाते हैं। यदि किसी उम्मीदवार को जरूरी समर्थन नहीं मिला हो, तो चिमनी से काला धुआं निकलता है। लेकिन जब पोप चुन लिया जाता है, तब सफेद धुआं उठता है। यह पूरी दुनिया को संकेत देता है कि अब चर्च को नया नेता मिल गया है। 

काले और सफेद धुएं का क्‍या अर्थ ?

वेटिकन की सिस्टिन चैपल से उठता धुआं दुनिया भर के कैथोलिकों के लिए एक बेहद अहम संकेत होता है। यह बताता है कि क्या चर्च को नया पोप मिल गया है या नहीं। जब किसी भी उम्मीदवार को ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाता, तो उस राउंड की वोटिंग विफल मानी जाती है। इसके बाद बैलेट्स को एक विशेष स्टोव में जला दिया जाता है, जिसमें कुछ विशेष रसायन मिलाए जाते हैं ताकि बहुत गहरा काला धुआं निकले। यह धुआं सिस्टिन चैपल की चिमनी से बाहर निकलता है, और इसका मतलब होता है: अभी नया पोप नहीं चुना गया है।

जब किसी कार्डिनल को दो-तिहाई बहुमत मिल जाता है और वह यह जिम्मेदारी स्वीकार कर लेता है, तो वोटिंग पूरी मानी जाती है। इसके बाद अंतिम बैलेट्स को एक अलग रसायन के साथ जलाया जाता है जिससे हल्का, साफ-सुथरा सफेद धुआं निकलता है। जैसे ही यह सफेद धुआं चिमनी से उठता है, पूरी दुनिया समझ जाती है कि अब चर्च को नया पोप मिल चुका है। यह परंपरा एक गुप्त प्रक्रिया को सार्वजनिक रूप से समझाने का एक बेहद प्रतीकात्मक तरीका है। इसमें शब्दों की नहीं, धुएं के रंग की जरूरत होती है।

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