नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क । लंबे समय से बीमार चल रहे ईसाईयों के सबसे बड़े धर्म गुरु पोप फ्रांसिस का 88 साल की आयु में आज सोमवार के दिन निधन हो गया। उन्होनें अपने निज निवास कासा सांता मार्टा स्थित वेटिकन में आखिरी सांस ली। वेटिकन की ओर से सोशल मीडिया पर बयान जारी कर बताया गया कि, पोप फ्रांसिस अब नहीं हमारे बीच नही रहे। लेकिन इन सब के बीच पोप अपने पहनावे व लाल जूते को लेकर चर्चा में बने रहते थे आखिर क्या है वो लाल जूते का किस्सा।
लंबे समय से चल रहे थे बीमार
बता दे, किडनी और सांस संबंधी गंभीर बीमारी से जूझ रहे पोप फ्रासिंस को रोम के जेमेली हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था, जहां उनके लाल जूते व पहनावे को लेकर खूब चर्चा चली। आखिर पोप फ्रांसिस हर जगह लाल जूते ही क्यों पहनते थे और किसी रंग का जूता क्यों नहीं?
साल 2003 से शुरू हुई ये परंपरा
साल 2013 में 16 वें पोप बेनेडिक्ट के इस्तीफे के बाद इतिहास में पहले लैटिन अमेरिकी पोप फ्रांसिस बने। जो अपनी सादगी की वजह से चर्चा में रहते थे। बता दें कि, पोप बनने से पहले उन्होंने चर्च से कभी एक रुपया नहीं लिया। साल 2003 से शुरू हुई लाल जूते की परंपरा, जब पहली बार इतावली मोची एंटोनियों अरेलानों ने पोप के लिए ये जूता बनाया था। इसे सबसे पहले पोप बेनेडिक्ट ने पहना इसके बाद पोप फ्रांसिस ने भी इस परंपरा को जिंदा रखा। जिसके बाद ये जूता ट्रेडमार्क बन गया जिसे लाल चमड़े का बनाया गया था।
एंटोनियो अरेलानों ने बताई बात
एक प्रतिष्ठित अखबार के अनुसार, इतावली मोची ने रोम की सड़कों पर भीड़ को देखा जिसमें कस्टमर टेलीविजन पर कार्डिनल रैटजिंगर था जिसके बाद आम दर्शन के दौरान नए पोप को लाल रंग के जूते देने का मन बनाया। और जब इतावली मोची आम दर्शन सभा में पहुंचे तो पोप ने उन्हें तुरंत पहचान लिया और बोले यह मेरा शू बनानेवाला है। और उस दिन एंटोनियों अरेलानों के लिए अद्भुत क्षण था।
कार्डिनल्स भी लाल रंग के जूते पहनते थे
ईसाई धर्म के अनुसार, लाल रंग शहादत और ईसा मसीह के जुनून का प्रतीक माना जाता है, जिसे सदियों से बहाए गए कैथोलिक शहीदों के खून का प्रतीक भी माना जाता है। इसलिए चर्च के इतिहास में यह रंग पहले कार्डिनल बनने की भी याद में इस्तेमाल किया जाता है। क्योंकि कार्डिनल्स भी लाल रंग के जूते पहनते थे।




