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Wednesday, March 18, 2026
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”किसी भी बांग्लादेशी या रोहिंग्या को मुंबई में नहीं रहने देंगे, भाजपा मंत्री नितेश राणे की खुली चेतावनी

भाजपा मंत्री ने नितेश राणे ने कहा कि मुंबई में बांग्लादेशी और रोहिंग्या प्रवासियों को नहीं रहने देंगे, नितेश राणे ने दी 15 जनवरी तक डेडलाइन दी है।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। मुंबई में एक बार फिर से सांप्रदायिक और राजनीतिक बहस तेज हो गई है। महाराष्ट्र सरकार में मंत्री और भाजपा नेता नितेश राणे ने हाल ही में एक बयान दिया है, जिसने सोशल मीडिया और मीडिया जगत में हलचल मचा दी है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी भी बांग्लादेशी या रोहिंग्या प्रवासी को मुंबई में रहने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इस बयान के साथ ही उन्होंने डेडलाइन 15 जनवरी तय कर दी, जिसके बाद वह चेतावनी देते हुए कह रहे हैं कि 16 जनवरी से मुंबई में बांग्लादेशियों और रोहिंग्या समुदाय के लोगों को टिकने नहीं दिया जाएगा।

”मैं सभी मुसलमानों के खिलाफ नहीं हूं”

नितेश राणे ने अपने बयान में कहा, मैं सभी मुसलमानों के खिलाफ नहीं हूं। जो राष्ट्रवादी मुसलमान हैं, हम उनके साथ हैं। लेकिन मैं दूसरों से कहना चाहता हूं कि मुंबई में जो भी बांग्लादेशी या रोहिंग्या हैं, वे 15 जनवरी तक अपना सामान पैक कर लें। 16 जनवरी से हम किसी भी बांग्लादेशी या रोहिंग्या को मुंबई में नहीं रहने देंगे। मैं यह खुली धमकी दे रहा हूं। मुंबई हमारा है, सभी हिंदुओं और राष्ट्रवादियों का। इस बयान ने राजनीतिक और सामाजिक रूप से व्यापक चर्चा को जन्म दिया है।

बहुसांस्कृतिक और बहुधर्मी माहौल को लेकर चिंता बढ़ी

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान चुनावी राजनीति और हिंदू राष्ट्रवाद की भावना को साधने के प्रयास के रूप में सामने आया है। नितेश राणे ने साफ शब्दों में यह संदेश दिया कि वह केवल ‘राष्ट्रवादी मुसलमानों’ के साथ हैं, जबकि जो लोग उनकी परिभाषा में नहीं आते, उनके लिए मुंबई में रहने की जगह नहीं होगी। उनके इस बयान ने शहर में बहुसांस्कृतिक और बहुधर्मी माहौल को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

राणे के बयान को लेकर भारी प्रतिक्रिया देखने को मिली

सोशल मीडिया पर राणे के बयान को लेकर भारी प्रतिक्रिया देखने को मिली। कुछ लोग उनके इस कदम का समर्थन कर रहे हैं और इसे शहर में सुरक्षा और शांति बनाए रखने के लिए आवश्यक बता रहे हैं। वहीं, कई लोग इसे सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने वाला कदम करार दे रहे हैं। अधिकार और मानवाधिकार संगठन भी इस बयान की निंदा कर चुके हैं और इसे वैधानिक और संवैधानिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण बताते हुए सवाल उठा रहे हैं कि क्या किसी नागरिक या प्रवासी को उनके धर्म, देश या जातीय पहचान के आधार पर मुंबई छोड़ने के लिए मजबूर किया जा सकता है।

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