नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क । भगवान राम की जीवनगाथा रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि का जन्म आश्विन मास की पूर्णिमा के दिन हुआ माना जाता है। सनातन परंपरा से जुड़े लोग उनके जन्मदिन को वाल्मीकि जयंती के रूप में उत्साहपूर्वक मनाते हैं, जिसमें उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है और उनके योगदान को याद किया जाता है।
इस साल महर्षि वाल्मीकि की जयंतीआज 7 अक्टूबर को मनाई जाएगी। उन्हें संस्कृत के आदि कवि और रामायण के प्रामाणिक रचयिता के रूप में सम्मानित किया जाता है। जन्मोत्सव पर उनके जीवन, शिक्षाओं और योगदान को याद करते हुए पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
महर्षि वाल्मीकि के बचपन की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, महर्षि वाल्मीकि का बचपन का नाम रत्नाकर था। उनके जन्म को लेकर कई किंवदंतियां प्रचलित हैं। कुछ उन्हें ब्राह्मण परिवार में जन्मा बताते हैं, जबकि कुछ के अनुसार वे माता-पिता से बिछड़ने के बाद शिकारियों के संपर्क में आए। युवावस्था में वे लूट-पाट करके परिवार का पालन-पोषण करते थे।
मान्यता है कि, युवावस्था में महर्षि वाल्मीकि ने महर्षि नारद को लूटने का प्रयास किया था। लेकिन नारद मुनि की शिक्षा और उपदेश से उनका हृदय परिवर्तन हुआ। इसके बाद उन्होंने पूर्व में किए गए पापों का प्रायश्चित करने के लिए कठोर तप और साधना प्रारंभ की।
माना जाता है कि, महर्षि वाल्मीकि अपने कठोर तप में इतने लीन हो गए कि उन्हें बाहरी दुनिया का भान नहीं रहा। इस दौरान उनके शरीर पर दीमक का टीला बन गया। इसी विशेष घटना के कारण उनका नाम रत्नाकर से बदलकर वाल्मीकि रखा गया, जो “दीमक वाला” अर्थ में प्रयोग हुआ।
महर्षि वाल्मीकि और रामायण
महर्षि वाल्मीकि को भगवान राम के युग का माना जाता है। मान्यता है कि उन्होंने माता सीता को अपने आश्रम में आश्रय दिया, जहां उनके पुत्र लव और कुश का जन्म हुआ। वाल्मीकि ने उन्हें रामायण का ज्ञान दिया और कहा जाता है कि लव और कुश ने सबसे पहले रामायण का गान किया।
वाल्मीकि जयंती पर पूजा विधि
वाल्मीकि जयंती के दिन सूर्योदय से पहले उठें, स्नान और ध्यान करें और अपने पूजा स्थल को स्वच्छ करें। वहां महर्षि वाल्मीकि की मूर्ति या चित्र स्थापित करके धूप, दीप और पुष्प अर्पित करें। पूजा के बाद वाल्मीकि रामायण का पाठ कर उनके जीवन और शिक्षाओं का स्मरण करें।
वाल्मीकि जयंती पर सामाजिक श्रद्धांजलि और दान
वाल्मीकि जयंती के दिन देशभर में उनके प्राकट्य वाले दिन झांकियां और शोभा यात्राएं आयोजित की जाती हैं। इस अवसर पर लोगों को जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और धन का दान करना चाहिए। समाज सेवा और वाल्मीकि के शिक्षाओं का पालन कर उनका सम्मान किया जाता है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है)




