नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क । हिंदू धर्म में पितृ पक्ष को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और आर्शीवाद प्राप्ति के लिए पूजा-अर्चना करते हैं। श्रद्धालु इस समय श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के माध्यम से अपने पूर्वजों की याद करते हैं और उन्हें सम्मानित करते हैं।
शास्त्रों में पितृ पक्ष का महत्व
शास्त्रों में बताया गया है कि, पितृ पक्ष में धर्म-कर्म और पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को शांति और मोक्ष प्राप्त होती है। ऐसे में कई लोग पिंडदान के लिए गया जाते हैं, जिसे सबसे पवित्र तीर्थस्थल माना जाता है, ताकि अपने पूर्वजों को सम्मान और आशीर्वाद दे सकें।
इस पितृ पक्ष पर हम आपको कुछ प्रसिद्ध और पवित्र स्थलों के बारे में बताएंगे, जहां आप अपने पूर्वजों का श्राद्ध कर सकते हैं। इन स्थानों पर पूर्वजों को श्रद्धांजलि देना अत्यंत पुण्यकारी और शुभ माना जाता है।
काशी में पितृ पक्ष: मणिकर्णिका घाट और पिशाच मोचन कुंड
शिव की नगरी काशी में स्थित मणिकर्णिका घाट और पिशाच मोचन कुंड श्राद्ध और पिंडदान के लिए खास और महत्वपूर्ण मानी जाती है। कहा जाता है कि, यहां पूर्वजों की आत्मा को शिवलोक की प्राप्ति होती है। पितृ पक्ष के दौरान परिवार सहित यहां आकर अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि दी जा सकती है।
हरिद्वार में पितृ पक्ष: मोक्षदायिनी नगरी
गंगा तट पर बसे हरिद्वार को मोक्षदायिनी कहा जाता है। पितृ पक्ष के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्राद्ध और दान करने आते हैं। मान्यता है कि नारायण शिला पर किए गए श्राद्ध से प्रेतयोनि में भटक रही पितरों की आत्मा को शांति मिलती है।
प्रयागराज में पितृ पक्ष: पितरों की आत्मा को शांति
उत्तर प्रदेश का प्रयागराज पितृ पक्ष में श्राद्ध और तर्पण के लिए अत्यंत प्रसिद्ध है। यहां किए गए तर्पण से पितर जन्म-जन्मांतर के बंधन से मुक्त होते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहीं पर भगवान राम ने अपने पिता दशरथ का तर्पण किया था।
पुरी में पितृ पक्ष: जगन्नाथ धाम
चार धामों में शामिल पुरी, जहां भगवान जगन्नाथ का मंदिर स्थित है, पितृ पक्ष में श्राद्ध और पिंडदान के लिए प्रसिद्ध है। ओडिशा के इस पवित्र स्थल पर पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को शांति और मुक्ति मिलती है।
गया में पितृ पक्ष: मुक्तिधाम
बिहार के गया में पितृ पक्ष में श्राद्ध करने से सात पीढ़ियों के पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है, इसलिए इसे मुक्तिधाम कहा जाता है। इस दौरान यहां भारी भीड़ रहती है। विष्णुपद मंदिर और फल्गु नदी के किनारे पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा प्रचलित है।




