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Friday, March 13, 2026
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केरल का छुपा हुआ कश्मीर: कंथलूर में मिलती है बर्फ जैसी ठंड और अनोखी परंपराएं

केरल का कंथलूर अपनी ठंडी आबोहवा, सेब के बगीचों, चंदन के जंगलों और 60 साल से चल रही बार्टर प्रणाली के कारण ‘केरल का कश्मीर’ कहलाता है।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। अगर आपको लगता है कि आपने केरल की सारी खूबसूरती देख ली है, तो कंथलूर आपकी इस सोच को बदल सकता है। मुन्नार से करीब 50 किलोमीटर दूर विस्तीर्ण पहाड़ियों के बीच बसा यह शांत गांव अपनी ठंडी आबोहवा, सेब के बगीचों, चंदन के जंगलों और 60 साल से चली आ रही अनोखी बार्टर प्रणाली के कारण ‘केरल का कश्मीर’ कहा जाता है। सर्दियों के मौसम में यहां का नजारा किसी स्वर्ग से कम नहीं लगता।

ठंड में और भी खुबसूरत हो जाता है कंथलूर

समुद्र तल से करीब 1,500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कंथलूर दक्षिण भारत के उन गिने-चुने इलाकों में शामिल है, जहां सर्दियों में तापमान काफी नीचे चला जाता है। दिसंबर से फरवरी के बीच यहां सुबह-सुबह हल्की धुंध, ठंडी हवाएं और पहाड़ियों पर जमी ओस इसकी खूबसूरती में चार चांद लगा देती है। यही वजह है कि यह इलाका सर्दियों की छुट्टियों के लिए एक आदर्श हिल स्टेशन माना जाता है।

1962 से आज तक जिंदा है बार्टर सिस्टम

कंथलूर की सबसे अनोखी पहचान यहां आज भी चल रहा वस्तु-विनिमय यानी बार्टर सिस्टम है। वर्ष 1962 में शुरू हुई यह परंपरा आज भी कायम है। गांव की एक खास दुकान पर स्थानीय लोग अपनी खेती से उगाई गई फसलें जैसे लहसुन, अदरक, सरसों, धनिया, बीन्स जैसी सब्जियां लेकर आते हैं और बदले में उन्हें चावल, दाल और अन्य जरूरी सामान दिया जाता है। करीब 160 परिवार इस दुकान के माध्यम से अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करते हैं। डिजिटल युग में भी कंथलूर में यह परंपरा आत्मनिर्भरता और सामुदायिक विश्वास का मजबूत उदाहरण बनी हुई है।

12 साल में नीली हो जाती हैं पहाड़ियां

कंथलूर का एक और विश्व प्रसिद्ध आकर्षण है नीलकुरिंजी फूल। यह फूल हर 12 साल में एक बार खिलता है और उस दौरान पूरी पहाड़ी नीले रंग की चादर से ढक जाती है। यह मंज़र इतना दुर्लभ और मनमोहक होता है कि देश-विदेश से पर्यटक इसे देखने पहुंचते हैं। पिछली बार नीलकुरिंजी 2018 में खिले थे, इसलिए अगली बार ये फूल 2030 में खिलेंगे। दिलचस्प बात यह है कि यहां की कुछ जनजातियां पहले अपनी उम्र का हिसाब भी इसी फूल के चक्र के आधार पर लगाया करती थीं।

क्यों कहा जाता है कंथलूर को ‘केरल का कश्मीर’?

कंथलूर पूरे केरल का एकमात्र इलाका है, जहां सेब की खेती होती है। ठंडी जलवायु और विशेष मिट्टी के कारण यहां उच्च गुणवत्ता वाले सेब उगते हैं। यही कारण है कि इसे ‘केरल का कश्मीर’ कहा जाता है। इसके अलावा यहां स्ट्रॉबेरी, संतरा, आड़ू और कई अन्य फलों की खेती भी बड़े पैमाने पर होती है। पर्यटक यहां खुद बागों में जाकर ताजे फल तोड़ने का अनुभव भी ले सकते हैं।

चंदन के जंगल और ‘लिक्विड गोल्ड’ की खुशबू

कंथलूर और इसके पास स्थित मरयूर इलाका केरल के उन चुनिंदा क्षेत्रों में है, जहां प्राकृतिक रूप से चंदन के पेड़ पाए जाते हैं। इन जंगलों की सुरक्षा सरकार द्वारा की जाती है। लोगों के बीच चंदन के तेल को ‘लिक्विड गोल्ड’ कहा जाता है। इन जंगलों से उठती चंदन की भीनी खुशबू पूरे वातावरण को खास बना देती है।

कंथलूर में घूमने के लिए कई प्रमुख और दर्शनीय स्थल हैं, जिनमें चिन्नार वाइल्डलाइफ सेंचुरी और अनामुडी शोला नेशनल पार्क खास तौर पर शामिल हैं, जहां ट्रैकिंग, वाइल्डलाइफ और खूबसूरत झरनों का रोमांचक अनुभव मिलता है। इसके अलावा मुनियारा डोलमेंस नवपाषाण युग के विशाल पत्थर के दफन कक्ष हैं, जिनकी उम्र लगभग 3000 ईसा पूर्व मानी जाती है। यहां के ऑर्गेनिक फार्म और फल बगीचों में पर्यटक सेब, स्ट्रॉबेरी और संतरे जैसे ताजे फलों को खुद तोड़ने का अनोखा अनुभव भी ले सकते हैं, वहीं चंदन के पेड़ों से घिरा क्योर मठ पर्यटकों को शांति और आध्यात्मिक सुख प्रदान करता है।

कंथलूर घूमने का सबसे अच्छा समय सितंबर से मार्च के बीच माना जाता है, जब मौसम ठंडा और सुहावना रहता है और खासकर दिसंबर-जनवरी में यहां की ठंड दक्षिण भारत के बाकी इलाकों से बिल्कुल अलग अनुभव देती है। यहां पहुंचने के लिए सबसे नजदीकी हवाई अड्डा कोचीन इंटरनेशनल एयरपोर्ट है, जबकि नजदीकी रेलवे स्टेशन अलुवा और थ्रिशूर हैं, जहां से सड़क मार्ग द्वारा टैक्सी या बस के जरिए कंथलूर आसानी से पहुंचा जा सकता है। कुल मिलाकर, अगर आप भीड़भाड़ से दूर प्रकृति के बीच शांत, ठंडी और अनोखी संस्कृति वाली जगह की तलाश में हैं, तो कंथलूर आपके लिए एक बेहतरीन डेस्टिनेशन साबित हो सकता है।

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