नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। आज के दौर में जहां धोखाधड़ी, चोरी और फरेब आम बात हो गई है, वहीं भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य नागालैंड का एक छोटा सा गांव देश-दुनिया के लिए ईमानदारी की मिसाल बनकर उभर रहा है। इस गांव का नाम है खोनोमा, जहां दुकानें तो हैं, लेकिन दुकानदार नहीं।
जी हां, आपने सही पढ़ा। खोनोमा गांव की दुकानों पर न कोई सेल्समैन होता है, न कोई ताला और न ही कोई सीसीटीवी कैमरा। लोग अपनी जरूरत का सामान खुद चुनते हैं और उसकी कीमत पैसे के तौर पर वहीं रखकर चले जाते हैं। यहां विश्वास की एक ऐसी संस्कृति जमी हुई है, जिसकी मिसाल शायद ही कहीं और देखने को मिले।
सालों से कायम है भरोसे की यह परंपरा
खोनोमा गांव में यह कोई नई पहल नहीं है, बल्कि वर्षों पुरानी परंपरा है। यहां के लोग मानते हैं कि ईमानदारी और दूसरों के अधिकार का सम्मान ही इंसान की असली पहचान है। यही सोच यहां की जीवनशैली में रच-बस चुकी है। बच्चों को बचपन से यही सिखाया जाता है कि झूठ बोलना या किसी का हक छीनना पाप है।
इस गांव की एक और खास बात यह है कि अब तक यहां चोरी या किसी भी तरह की आपराधिक घटना दर्ज नहीं की गई है। यहां की फिजा में विश्वास और शांति घुली हुई है, जो आने वाले हर पर्यटक को भी महसूस होती है।
सिर्फ ईमानदारी नहीं, पर्यावरण संरक्षण में भी अव्वल
खोनोमा गांव को भारत का पहला ‘ग्रीन विलेज’ होने का गौरव भी प्राप्त है। यहां के लोग प्रकृति से बेहद प्रेम करते हैं। गांववाले जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए सामूहिक प्रयास करते हैं। साफ-सफाई, हरियाली और पर्यावरण संरक्षण यहां के जीवन का अहम हिस्सा है।
पर्यटकों के लिए बना है आदर्श गंतव्य
अपनी अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और सांस्कृतिक विविधता के चलते खोनोमा गांव अब देश-विदेश के पर्यटकों को भी आकर्षित कर रहा है। यह स्थान उन लोगों के लिए आदर्श है, जो शहरों की भीड़-भाड़ और भागदौड़ से दूर सुकून की तलाश में हैं।
कैसे पहुंचे खोनोमा गांव?
अगर आप भी इस अनोखे गांव की सैर पर जाना चाहते हैं तो सबसे पहले नागालैंड की राजधानी कोहिमा पहुंचें।
कोहिमा से खोनोमा की दूरी लगभग 20 किलोमीटर है, जिसे टैक्सी या लोकल वाहन से तय किया जा सकता है।
निकटतम रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट डिमापुर में स्थित है, जहां से कोहिमा तक बस और टैक्सी सेवा उपलब्ध है।
जहां आजकल भरोसे की कमी हर क्षेत्र में दिखती है, वहीं खोनोमा जैसे गांव देश के लिए उम्मीद की किरण बनकर उभरते हैं। यह गांव न सिर्फ ईमानदारी का प्रतीक है, बल्कि यह दिखाता है कि अगर समाज मिलकर चले, तो बिना डर और लालच के भी जिंदगी जी जा सकती है।





