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झारखंड के खूंटी जिले में ग्रामीणों ने श्रमदान से खड़ा कर दिया पानी बचाने का अनूठा आंदोलन

रांची, 22 मार्च (आईएएनएस)। वल्र्ड वाटर डे पर 22 मार्च को जब देश-दुनिया में जगह-जगह पानी बचाने की चिंता पर मंथन चल रहा था, तब झारखंड के उग्रवाद प्रभावित खूंटी जिले के एक छोटे से गांव घाघरा में स्त्री-पुरुष और बच्चे यहां से होकर गुजरने वाली बनई नदी का पानी बचाने-सहेजने के लिए एक अनूठे श्रमदान अभियान में जुटे थे। 60-70 ग्रामीणों ने चार-पांच घंटे की मेहनत से इस नदी पर बालू की बोरियों से बांध बना डाला। इसके बाद लगभग एक किलोमीटर की दूरी तक नदी में भरपूर पानी है। नदी के आस-पास इस बार तकरीबन 20 एकड़ जमीन पर ग्रामीणों ने तरबूज की खेती की है। मंगलवार को बोरी बांध का निर्माण हो जाने के बाद ग्रामीण अब इत्मीनान हैं कि फसल की सिंचाई के लिए पानी की कमी नहीं होगी। दरअसल घाघरा गांव में बना यह बोरी बांध पूरे जिले में पानी बचाने के लिए ग्रामीणों के सामुदायिक सहयोग से 2018 से चल रहे जल संरक्षण अभियान की 171वीं कड़ी है। इसके पहले जिले के अलग-अलग गांवों में बीते साढ़े तीन साल में ऐसे 170 बोरी बांध बनाये जा चुके हैं और 70 से ज्यादा गांवों के लोग इनके जरिए एक हजार एकड़ से भी अधिक जमीन पर सिंचाई कर रहे हैं। जिन गांवों में कभी सिंचाई के अभाव में फसलें सूख जाती थीं या खेत परती रह जाते थे, वहां अब भरपूर हरियाली है। खूंटी में हो रहे इस प्रयोग की गूंज अब अब दूर-दूर तक पहुंचने लगी है। जल संरक्षण के लिएइस बोरीबांध मॉडल को दो नेशनल अवार्ड मिल चुके हैं। इस मॉडल को स्कॉच अवार्ड और राष्ट्रीय जल शक्ति मंत्रालय की ओर से राष्ट्रीय जलशक्ति पुरस्कार दिया जा चुका है। इंटरनेशनल ई बुक अर्थ डे नेटवर्क ने भी इस मॉडल को अपने पन्नों पर स्थान दिया है। खूंटी जिले में दर्जनों छोटी पहाड़ी नदियां, बरसाती नाले और जलस्रोत हैं, लेकिन इनका पानी गर्मी में या तो सूख जाता था या फिर बेकार चला जाता था। बालू के अवैध खनन, जंगलों की कटाई और अतिक्रमण से ऐसी कई नदियों और जलस्रोतों का वजूद मिट रहा था। बोरी बांध के सामुदायिक अभियान की बदौलत अब इन्हें नई जिंदगी मिल रही है। इस अभियान से सरकारी अफसर और स्थानीय जनप्रतिनिधि भी जुड़ने लगे हैं। मंगलवार को घाघरा गांव में बनई नदी पर बोरी बांध बनाने के अभियान के दौरान जिले के उपायुक्त शशि रंजन और बीते लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी रहे कालीचरण मुंडा भी मौजूद रहे। केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री और खूंटी के सांसद अर्जुन मुंडा ने इस अभियान को लेकर ट्वीट किया और इसे शानदार पहल बताया। यह अभियान 2018 में शुरू हुआ था। इस सोच के पीछे स्थानीय पत्रकार अजय शर्मा, ग्रामीण सबीता संगा, निखिल गुप्ता, देवा हस्सा, मो शकील पाशा, सुनील ठाकुर, संदीप कुमार गुप्ता, सुशील सोय जैसे लोग थे। इन्होंने सेवा वेलफेयर नामक एक सोसायटी बनाई और विभिन्न गांवों में जाकर ग्रामीणों के साथ सभा कर पानी बचाने की सोच साझा की। शुरूआत तपकरा गांव से हुई। गांव के लोग फावड़ा-बेलचा-कड़ाही लेकर इकट्ठा हुए। रांची में उन दिनों रिंग रोड के निर्माण में सिमेंट का काम बड़े पैमाने पर चल रहा था। सोसायटी ने वहां से सिमेंट की खाली बोरियां मंगाई। ग्रामीणों ने इन बोरियों में बालू भरकर कुछ ही घंटों में नदी पर बांध बना डाला। इसके बाद सभी लोगों ने एक साथ मिलकर यहीं खिचड़ी पकाई और सामूहिक भोज किया। अभियान के सूत्रधारों में से एक अजय शर्मा बताते हैं कि जगह-जगह बोरी बांध बनने से सिंचाई, नहाने-धोने, मवेशियों को पानी पिलाने की समस्याएं खत्म होने लगीं। आस-पास भू-गर्भ जल स्तर भी बढ़ने लगा। सोसाइटी में अग्रणी भूमिका निभाने वाली बबीता सांगा बताती हैं कि हमलोग ग्रामसभा में जाकर बोरीबांध बनाने का प्रस्ताव रखते हैं। ग्रामसभा उसे पास करती है और इसके बाद सोसाइटी के लोग खूंटी जिले के बड़े-छोटे संवदेकों, मिक्सचर और सिमेंट प्लांटों के संचालकों से सिमेंट की खालू बोरियां मांगकर उसे गांव वालों को उपलब्घ कराते हैं। सामूहिक भोज के लिए कच्चा राशन भी उपलब्ध कराया जाता है। आदिवासी समाज में श्रमदान की पुरानी परंपरा रही है और इसे मदईत नाम से जाना जाता है। इसी परंपरा के अनुसार निर्धारित तिथि को गांव के लोग जुटते हैं और श्रमदान करके तीन-चार घंटे में बोरीबांध का निर्माण कर लेते हैं। निर्माण स्थल के बगल में ही भोजन बनता है और गांव के लोग काम खत्म करने के बाद सामूहिक रूप से भोजन करते हैं। इससे गांव का माहौल खुशनुमा होता है। सेवा वेलफेयर सोसाइटी के लोगों ने अब सिमडेगा जिले के डीसी के बुलावे पर वहां भी बोरीबांध बनवाने का काम शुरू किया है। खूंटी जिले के अति उग्रवाद प्रभावित गांवों बिरबांकी, उम्बुलबाहा,डाहंगा, कुईल, कोड़ाकेल, कोटना में भी इस तरह के बोरी बांध के जरिए पानी की समस्या काफी हद तक दूर हो गई है। खूंटी के उपायुक्त शशि रंजन कहते हैं कि ग्रामीणों की सामूहिक भागीदारी से जल संरक्षण के उद्देश्यों को गति मिल रही है। –आईएएनएस एसएनसी/एएनएम

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