नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। राष्ट्रगीत वंदे मातरम् इन दिनों एक बार फिर देश की राजनीति और संसद की चर्चा का बड़ा विषय बन गया है। सदन में इस पर ऐतिहासिक बहस चल रही है। इसी बीच लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि वंदे मातरम् में अब तक कितने बदलाव हुए हैं और इसकी असली यानी मूल स्क्रिप्ट क्या थी? आइए आसान भाषा में इसका पूरा इतिहास जानते हैं।
1870 के दशक में लिखा गया था वंदे मातरम्
वंदे मातरम् की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में की थी। यह गीत उन्होंने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘आनंदमठ’ में शामिल किया, जो साल 1880 में प्रकाशित हुई। इस गीत में भारत माता को एक देवी के रूप में दिखाया गया था और इसमें कई ऐसे छंद भी थे, जिनमें हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख था। जैसे ही यह गीत सामने आया, यह आज़ादी के आंदोलन का बड़ा प्रतीक बन गया और देशभर में तेजी से लोकप्रिय हो गया।
1937 में किया गया बड़ा बदलाव
जैसे-जैसे आज़ादी की लड़ाई तेज हुई, वंदे मातरम् जन आंदोलन का नारा बन गया। लेकिन 1930 के दशक में मुस्लिम नेताओं ने इसके कुछ छंदों पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि कुछ पंक्तियां सीधे तौर पर देवी-देवताओं की पूजा से जुड़ी हैं, जो इस्लामी मान्यताओं के खिलाफ हैं। सभी समुदायों को साथ लेकर चलने के उद्देश्य से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1937 में फैसला लिया कि वंदे मातरम् के केवल पहले दो छंदों को ही सार्वजनिक कार्यक्रमों में गाया जाएगा। ये दो छंद पूरी तरह गैर-धार्मिक थे। यह वंदे मातरम् के इतिहास का एकमात्र बड़ा आधिकारिक संशोधन माना जाता है।
क्यों जरूरी था यह संशोधन?
आजादी से पहले का दौर सांप्रदायिक रूप से काफी संवेदनशील था। कांग्रेस का उद्देश्य यह था कि कोई भी समुदाय खुद को अलग-थलग महसूस न करे। इस बदलाव का मकसद वंदे मातरम् को एकता का प्रतीक बनाए रखना था, न कि किसी विवाद का कारण। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने वंदे मातरम् के दो छंदों वाले इसी संशोधित रूप को आधिकारिक रूप से भारत का राष्ट्रगीत घोषित किया। तब से लेकर आज तक इसमें कोई और बदलाव नहीं किया गया है।




