डॉ बलराम त्रिपाठी सिद्धार्थनगर, 03 जून (हि.स.)। जिले के तीन सौ पैसठ मंदिर व कुएं वाले प्राचीन कस्बे बिस्कोहर की पहचान मिटती जा रही है। उदासीनता और प्रशासनिक उपेक्षा के चलते यह निर्माण अब खंडहर में तब्दील होते जा रहे हैं। यह न सिर्फ भारतीय स्थापत्य कला के नमूने के रूप में देखा जा रहा है बल्कि भारत नेपाल संबंधों में थारू जनजाति के योगदानों को भी भुलाए जाने जैसे कृत्य माना जा रहा है। आजादी से पहले बिस्कोहर कस्बा एक बड़ा बाजार था। बूढ़ी राप्ती नदी के दक्षिण स्थित इस कस्बे में पड़ोसी देश नेपाल से थारू जनजाति के लोग यहां आने लगे। मसाला व जड़ी-बूटी बेचकर खाने-पीने के सामान खरीदने लगे और अपनी आजीविका चलाने लगे। शैव सम्प्रदाय के होने के कारण थारू जनजातियों में भगवान शिव के प्रति असीम आस्था और श्रद्धा थी। भारत-नेपाल संबंधों को प्रगाढ़ बनाया थारुओं का नेपाल से आना-जाना था और ये दोनों देशों में एक विशेष प्रकार का लगाव स्थापित करने का प्रयास करते थे। इस वजह से इन्होंने नेपाल से भारतीय लोगों का आपसी सामंजस्य प्रगाढ़ बनाने का कार्य शुरू किया। पूजा पद्धतियों में समानता ने इन्हें आपसी सामंजस्य स्थापित करने में काफी मदद की। व्यावसायिक संबंधों ने भी इसे और प्रगाढ़ किया। व्यवसाय-आमदनी बढ़ी तो बनने लगे मंदिर-कुंए जैसे-जैसे व्यवसाय बढ़ा, वैसे-वैसे इनकी खुशियां और आमदनी बढ़ी। ईश्वर के प्रति आस्था और श्रद्धा भी बढ़ने लगी। मन्नतें पूरी होने लगीं और उनके एवज में मंदिरों का निर्माण शुरू हुआ। ठहरने के लिए धर्मशाला का भी निर्माण करवाया गया। स्थानीय भारतीयों ने भी दिया साथ थारुओं की देखादेखी बिस्कोहर के लोगों ने भी मंदिर और पोखरों का निर्माण शुरू कराया। परिणाम स्वरूप बिस्कोहर में 365 मंदिर, कुंओं-पोखरों व धर्मशालाओं का जाल खड़ा हो गया। अधिकांश मंदिरों का निर्माण भगवान शिव का था। भारतीयों द्वारा निर्मित मंदिरों में राम-जानकी, हनुमान व माता दुर्गा का मंदिर रहा। रास्तों का अब भी वही है पुराना मंजर बाजार में आने-जाने के लिए सुव्यवस्थित व्यवस्था थी। लेकिन अब भी वही पुरानी व्यवस्था है। संकरे रास्ते बाजार की भीड़ को झेल नहीं पातीं है। कीचड़ व गंदगी की भरमार है। बजबजाती नालियां इस बाजार की उपेक्षा की गवाही दे रही हैं। लोग अब भी सड़कों के दोनों तरफ खड़े होकर दुबक कर दुकानों से खरीददारी करने को विवश हैं। यहां की बदहाली और आजाद देश की तेजी से बदलती परिस्थियों के कारण यह बाजार धीरे-धीरे टूटने लगा है। खण्डहर बने मंदिर, पोखरों पर मकान नेपाल के थारुओं का आवागमन भी धीरे-धीरे बंद हो गया है। देखरेख के अभाव में मंदिर खण्डहर में तब्दील हो रहे हैं। पोखरों को पाटकर लोगों ने अवैध कब्जा कर लिया है। कभी रेन हार्वेस्टिंग का काम करने वाले कुंओं का अस्तित्व खतरे में है। अब सिर्फ 24 मंदिर ही शेष बचे हैं। गजेटियर में दर्ज है इतिहास गजेटियर में यहां के मंदिरों के बारे में भी लिखा गया है। चीनी यात्री फाह्यान के भी इसी मार्ग से श्रावस्ती जाने की चर्चा है। बावजूद इसके न तो शासन ने इस पर अपना ध्यान आकृष्ट किया और न ही जिला प्रशासन ने ही इसके पुनरुद्धार की कोई योजना बनाई। …तब विकास को मिले गति, स्थापत्य कला हो संरक्षित रामजानकी मंदिर के पुजारी नान्हू दास ने बताया कि जन सहयोग से मंदिर की रंगाई पुताई और पूजन सामग्री की व्यवस्था हो रही है। इधर, महाकालेश्वर मंदिर के पुजारी बाबा पुल्लुदास भी काफी आहत हैं। इनका कहना है कि उदासीनता ने यहां के मंदिरों को खंडहर बनाया है। पर्यटन विभाग को इसके संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए। इसका विकास होता तो प्राचीन स्थापत्यकला की सुरक्षा भी होती। उधर, हनुमान मंदिर के पुजारी बाबू लाल का कहना है कि उपेक्षा के कारण बिस्कोहर की पहचान मिट रही है। बोले एसडीएम इटवा के उप जिलाधिकारी उत्कर्ष श्रीवास्तव का कहना है कि जल्दी ही बिस्कोहर के विकास की योजना को मूर्त रूप देने का प्रयास शुरू होगा। जिलाधिकारी को पत्र भेज कर इससे अवगत कराया जाएगा। एक कार्य-योजना बनाने की अनुमति मांगी जाएगी। बिस्कोहर, एक प्राचीन धरोहर है। इसे संरक्षित करने का हर संभव प्रयास होगा। हिन्दुस्थान समाचार/




