नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। भारत में हर दिन हजारों की संख्या में बच्चे लापता हो रहे हैं, वह भी एक ऐसे दौर में जब हर कहीं पलक झपकते सूचना पहुंच जाती हो, पर यह हकीकत है यहां हर साल देशभर से लगभग 80,000 से ज्यादा बच्चे गायब हो रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के इस बारे में आंकड़े देखे जा सकते हैं। दिसंबर 2023 में जारी आंकड़े बताते हैं कि साल 2022 में 83,350 बच्चे गायब हुए थे जिनमें 20,380 लड़के थे और 62,946 लड़कियों के अलावा 24 ट्रांसजेंडर थे। इनमें ज्यादातर तलाश भी लिए गये लेकिन 2781 बच्चे हमेशा हमेशा के लिए ओझल हो गये।
जबकि इसके पहले एनसीआरबी ने जो डाटा 2022 में पेश किया था, उसमें लापता हुए बच्चों की संख्या 76,069 थी। मतलब साफ है कि अगले एक साल में लापता हुए बच्चों की संख्या में तकरीबन 6000 की बढ़ोतरी हो गई। जबकि 2021 में गायब होने वाले बच्चों की संख्या सिर्फ 33,650 थी। इन आंकड़ों से पता चलता है कि बच्चों के गायब होने की संख्या में भारी बढ़ोतरी हो रही है।
नेताओं के खोखले वादे
वैसे तो बच्चों की सुरक्षा के लिए हमेशा जब भी नेताओं को उनके विषय में बोलने को मिलता है वे उनके हित की योजनाओं को गिनाने एवं अपनी सरकार द्वारा दिए जा रहे लाभों की पूरी सूची गिना देते हैं, बच्चों के हित में काम करने की कई कसमें खायी जाती हैं और आधुनिक से आधुनिक उपकरण लगाकार सुरक्षा व्यवस्था किए जाने का संकल्प दोहराया जाता है। फिर भी मासूमों के गायब होने के सिलसिले में जरा भी कमी आने की बजाय बढ़ोतरी क्यों रही है? स्वाभाविक तौर पर यह बहुत ही आश्चर्य जनक है। वास्तव में यदि एक पल के लिए हम इस मामले में एनसीआरबी के आंकड़ों की जगह उन गैरसरकारी संस्थाओं पर यकीन करें, जो बच्चों के लापता होने की समस्या में काम करती हैं, तो बच्चों के गायब होने की वास्तविक संख्या इससे कहीं गुना ज्यादा सामने आती है।
हर एक मिनट में दो बच्चे गायब हो रहे हैं
इनके मुताबिक तो हर साल 80-85 हजार नहीं बल्कि कई लाख बच्चे गायब हो रहे हैं। यही वजह है कि आज देश में हर एक मिनट में कम से कम दो बच्चे गायब हो रहे हैं। घर से बिछुड़कर आखिर ये मासूम कहां चले जाते हैं? क्योंकि जो बच्चे अगले एक महीने तक नहीं मिलते, घरों से गायब होने वाले ऐसे बच्चों के घर वापस न आने की आशंका करीब सौ प्रतिशत हो जाती है। गायब होने के बाद जो बच्चे मिल जाते हैं, उनके बारे में तो हम थोड़ा-बहुत जानते भी होते हैं कि इन्हें कौन और कैसे बहला-फुसलाकर ले गया था, लेकिन जो बच्चे कभी लौटकर आये ही नहीं, उनके बारे में मां-बाप कुछ भी नहीं जानते। संचार के साधनों के बावजूद एक-डेढ़ प्रतिशत बच्चे गायब होने के बाद कभी वापस नहीं आते। हालांकि अपराधियों की धड़पकड़ में हाल के सालों में इजाफा हुआ है। पुलिस के पास आज पहले के मुकाबले जांच पड़ताल के बेहतर संसाधन हैं, इसके बाद भी गायब बच्चों की एक तय संख्या लौटकर घर नहीं आती, तो आखिर उनका होता क्या है? उनका कोई सुराग क्यों नहीं मिलता?
कम ही बच्चे लौटकर आते हैं वापस
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ऑफ इंडिया के डाटा विश्लेषण के मुताबिक हर दिन हजारों की संख्या में गायब होने वाले बच्चों में से बहुत मामूली संख्या में ही बच्चे लौटकर आ पाते हैं। सैकड़ों बच्चों की तो रिपोर्ट ही नहीं लिखी जाती, उनके मां-बाप द्वारा कोशिश किये जाने पर पुलिस उन्हें डांटकर थाने से भगा देती है। निठारी कांड का उदाहरण हमारे सामने है, उसमें क्रूरता की सभी हदें पार कर बच्चों को बलि चढ़ा दिया गया था, जिन बच्चों के मां-बाप ने पुलिस से उनके लापता होने की शिकायतें दर्ज कराने पहुंचे थे, पुलिस ने उनकी बात पर कोई गंभीरता से ध्यान ही नहीं दिया। वास्तव में जो बच्चे कभी भी वापस घर नहीं आ पाते, वो अपराधियों के चंगुल में फंस जाते हैं। गायब होने वाली लड़कियों के साथ अकसर रेप जैसी घिनौनी वारदातें होती हैं और ज्यादातर को मार दिया जाता है।
बच्चों के अंगों की होती है तस्करी
अगर इंटरनेशनल क्राइम पर नजर रखने वाले पत्रकारों की रिपोर्टें देखें तो पता चलता है कि ऐसे सैकड़ों बच्चों के अंगों की तस्करी होती है। कई गिरोह इस धंधे में इन्वोल्व हैं जोकि इन बच्चों के अंगों को निकाल लेते हैं और देश-विदेश में बेच देते हैं । बच्चे आतंकवाद का भी सबसे आसान हथियार बन जाते हैं। कुछ साल पहले आयी यूएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के सत्ता विरोधी सशस्त्र संगठनों ने बच्चों को अपने संघर्षों में हिस्सेदार बना दिया है। शायद इसीलिए बच्चों के खोने की आपराधिक घटनाओं में तमाम सरकारी, गैर सरकारी प्रयासों के बावजूद कमी नहीं आ रही है, आज देखने में यही आ रहा है कि लगातार इनके खोने की संख्या में इजाफा ही हो रहा है । जोकि वास्तव में बहुत चिंता की बात है ।





