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तब्लीगी जमात मामला : सुप्रीम कोर्ट ने कहा, काली सूची में डालने से वीजा अर्जी प्रभावित न हो

नई दिल्ली, 12 मई (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि राजधानी के निजामुद्दीन मरकज में आयोजित 2020 तब्लीगी जमात के कार्यक्रम के दौरान काली सूची में डाले गए व्यक्तियों के भविष्य के वीजा आवेदनों को काली सूची में डालने के आदेश से प्रभावित नहीं माना जाना चाहिए। न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर ने 2020 में तब्लीगी गतिविधियों में शामिल होने के आरोपों पर गृह मंत्रालय द्वारा काली सूची में डाले गए 35 देशों के नागरिकों द्वारा दायर याचिकाओं का निपटारा किया। पीठ में शामिल न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला ने कहा कि दोनों पक्षों द्वारा उठाए गए कानून के सवालों पर विचार किए बिना किसी भी विदेशी याचिकाकर्ता को काली सूची में डालने का कोई आदेश नहीं दिया गया है और न ही केंद्र द्वारा इस तरह के किसी भी ब्लैकलिस्टिंग आदेश को रिकॉर्ड में रखा गया है। शीर्ष अदालत ने संबंधित अधिकारियों को वीजा देने के लिए भविष्य के आवेदनों की जांच करने का निर्देश दिया। याचिकाकर्ताओं या इसी तरह के व्यक्तियों द्वारा मामला-दर-मामला आधार पर तब्लीगी जमात मंडली से जुड़े लगभग 3,500 लोगों को ब्लैकलिस्ट किया गया था। पीठ ने कहा कि विदेशी नागरिकों के भविष्य के वीजा आवेदनों पर कानून के अनुसार विचार किया जाना चाहिए और केंद्र के रुख से प्रभावित नहीं होना चाहिए, जिसने विदेशियों को 10 साल के लिए काली सूची में डाल दिया था। याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता सी.यू. सिंह और याचिकाएं एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड फुजैल अहमद अय्यूबी ने दायर की थीं। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि उन पर या इसी तरह के किसी अन्य व्यक्ति को काली सूची में डालने का कोई आदेश नहीं दिया गया था। केंद्र का प्रतिनिधित्व करने वाले सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि एक प्रावधान है कि प्रभावित लोग ब्लैकलिस्टिंग को रद्द कराने के लिए प्रतिनिधित्व कर सकते हैं, लेकिन एक निर्णय लेने के बाद वे इसे चुनौती नहीं दे सकते। उन्होंने तर्क दिया कि यदि एक संप्रभु राष्ट्र की सरकार द्वारा अपने नागरिक के साथ ऐसा ही किया जाता है, तो यह पूरी तरह से अस्वीकार्य होगा, लेकिन आपके क्षेत्र में प्रवेश करने की कोशिश कर रहे किसी विदेशी के साथ व्यवहार करते समय मानदंड अलग होगा। पीठ ने कहा कि भविष्य में प्रवेश की अनुमति देना सरकार का विशेषाधिकार है और भले ही काली सूची में डालने को रद्द कर दिया जाए, व्यक्ति की प्रविष्टि कार्यालय के रिकॉर्ड पर बनी रहती है और यदि कोई प्रतिनिधित्व करता है, तो शायद सरकार पुनर्विचार करेगी। शीर्ष अदालत ने कहा कि वीजा रद्द होने के कारण याचिकाकर्ता पहले ही भारत छोड़ चुके हैं और एकमात्र मुद्दा संबंधित अधिकारियों द्वारा पारित आदेश को काली सूची में डालने का है। इसमें कहा गया है कि वीजा आवेदनों पर विचार करते समय अधिकारियों को मामले के सभी पहलुओं को ध्यान में रखना होगा। –आईएएनएस एसजीके/एएनएम

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