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Friday, April 10, 2026
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पराली जलाना: इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए हाइड्रोजन पैदा कर सकते हैं किसान

नई दिल्ली, 1 अक्टूबर (आईएएनएस)। मानसून की वापसी की आधिकारिक तौर पर उलटी गिनती शुरू होने के साथ ही खराब वायु गुणवत्ता वाले दिनों की आशंका शुरू हो गई है। प्रदूषण का कारण बनने वाले कई स्रोतों में पंजाब और हरियाणा के किसानों द्वारा पराली (पराली जलाना) है। अब, किसान इस कृषि-कचरे से न केवल कमाई करने की आशा कर सकते हैं, बल्कि हाइड्रोजन के उत्पादन में भी मदद कर सकते हैं। पुणे के शोधकर्ताओं ने कृषि अवशेषों से हाइड्रोजन के सीधे उत्पादन के लिए एक अनूठी तकनीक विकसित की है। यह नवाचार हाइड्रोजन उपलब्धता की चुनौती पर काबू पाकर पर्यावरण के अनुकूल हाइड्रोजन ईंधन-सेल इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दे सकता है। भारत ने अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) के हिस्से के रूप में विश्व समुदाय से जिन कई कदमों का वादा किया है, उनमें से वैश्विक तापमान वृद्धि को प्रतिबंधित करने के लिए कार्बन उत्सर्जन को सीमित करने के लिए की जाने वाली कार्रवाई में भारत ने 2030 तक 450 गीगावाट अक्षय ऊर्जा का लक्ष्य निर्धारित किया है। हर जगह शोधकर्ता अक्षय ऊर्जा समाधान की दिशा में काम कर रहे हैं, जो सीमित कार्बन पदचिह्न् के साथ टिकाऊ होना चाहिए। इसे प्राप्त करने के सबसे किफायती तरीकों में से एक सस्ते, प्रचुर मात्रा में और नवीकरणीय स्रोत से हाइड्रोजन का उत्पादन करना है। कृषि अपशिष्ट, जिसे निपटान के लिए एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ता है, हाइड्रोजन उत्पादन के स्रोतों में से एक हो सकता है और यह ऊर्जा उत्पादन और अपशिष्ट निपटान की दोहरी समस्या को हल कर सकता है। भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के एक स्वायत्त संस्थान, अघरकर अनुसंधान संस्थान (एआरआई), पुणे के शोधकर्ताओं की एक टीम ने केपीआईटी टेक्नोलॉजीज के सेंटिएंट लैब्स के सहयोग से प्रयोगशाला स्तर पर प्रौद्योगिकी विकसित की है। एआरआई के निदेशक डॉ प्रशांत ढाकेफलकर ने कहा, हमारी तकनीक आज इस्तेमाल की जाने वाली पारंपरिक अवायवीय पाचन प्रक्रियाओं की तुलना में 25 प्रतिशत अधिक कुशल है। दो चरणों की प्रक्रिया बायोमास के पूर्व-उपचार को समाप्त करती है। इस प्रकार प्रक्रिया को किफायती और पर्यावरण के अनुकूल बनाती है। यह प्रक्रिया एक पाचन उत्पन्न करती है जो समृद्ध है पोषक तत्व, जिनका उपयोग जैविक उर्वरक के रूप में किया जा सकता है। प्रौद्योगिकी के डेवलपर्स ने समझाया कि हाइड्रोजन ईंधन उत्पादन प्रक्रिया में एक विशेष रूप से विकसित माइक्रोबियल कंसोर्टियम का उपयोग शामिल है जो सेल्यूलोज के बायोडिग्रेडेशन की सुविधा प्रदान करता है और हेमिकेलुलोज-समृद्ध कृषि अवशेष, जैसे कि धान, गेहूं, या मक्का के बायोमास, बिना थर्मो-केमिकलया एंजाइमी पूर्व उपचार करना है। डेवलपर्स ने कहा, प्रक्रिया पहले चरण में हाइड्रोजन और दूसरे में मीथेन उत्पन्न करती है। इस प्रक्रिया में उत्पन्न मीथेन का उपयोग अतिरिक्त हाइड्रोजन उत्पन्न करने के लिए भी किया जा सकता है। सेंटिएंट लैब्स के अध्यक्ष रवि पंडित ने कहा, अनुपयोगी कृषि अवशेषों से हाइड्रोजन पैदा करने की यह सफलता हमें ऊर्जा संसाधनों पर आत्मनिर्भर बनने में मदद करेगी। इससे किसान समुदाय को राजस्व का एक बड़ा प्रवाह भी मिलेगा। विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ओर से गुरुवार को जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया है कि वैज्ञानिकों, महाराष्ट्र एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन ऑफ साइंस (एमएसीएस-एआरआई) के डॉ एसएस डागर और प्रणव क्षीरसागर और केपीआईटी-सेंटिएंट के कौस्तुभ पाठक ने इस प्रक्रिया के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। साथ ही, आईपीआर की सुरक्षा के लिए एक भारतीय पेटेंट आवेदन दायर किया गया है। –आईएएनएस एसएस/आरजेएस

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